मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० मयमतम् चाहिये, जिससे उनका मुख केन्द्र की ओर रहे।।११२।। षड्भिः पञ्चचतुस्त्रिद्विमात्रे बिम्बोदयं भवेत्। तदर्धं वाहनोत्सेधं स्थानकासनमेव वा ।।११३।। इन देवों की प्रतिमा की ऊँचाई छः, पाँच, चार, तीन या दो अङ्गल होनी चाहिये एवं उनके वाहनों की ऊँचाई पूर्वोक्त माप की आधी होनी चाहिये। प्रतिमायें स्थानक मुद्रा ( खड़ी ) अथवा आसन मुद्रा ( बैठी ) में होनी चाहिये ।।११३।। मुक्तापवत्से मरीचौ विद्रुमं सवितर्यथ। पुष्परागं च वैडूर्यं विवस्वति विनिक्षिपेत् ।।११४।। आपवत्स पर मोती, मरीचि पर मूँगा, सविता पर पुष्पराग ( पोखराज ) तथा विवस्वान् पर वैदूर्य मणि रखना चाहिये।।११४।। वज्रमिन्द्रजये विद्यादिन्द्रनीलं तु मित्रके। रुद्रराजे महानीलं मरकतं तु महीधरे ।।११५।। इन्द्रजय पर हीरा, मित्रक पर इन्द्रनील, रुद्रराज पर महानील तथा महीधर पर मरकत ( पन्ना ) रखना चाहिये।।११५।। मध्यमे पद्मरागं तु विन्यसेद् गर्भभाजने। रत्नानि धातवश्चैव स्वस्वविस्तारभाजने ।।११६।। पात्र के मध्य में पद्मराग ( रुबी ) रखना चाहिये। रत्न एवं धातुओं को पात्र में उनके उचित स्थान पर रखना चाहिये।।११६।। तद्देवस्थानभावज्ञैरानीतानि निधापयेत्। हेमायस्ताप्ररूप्यैश्च स्वस्तिकानि चतुर्दिशि ।।११७।। उन देवों के स्थान एवं स्थिति को विधिपूर्वक ज्ञात कर रत्नादि को रखना चाहिये। चारो दिशाओं में सुवर्ण, आयस ( लौह ), ताँबे एवं चाँदी के स्वस्तिक रखने चाहिये।।११७।। ब्रह्मस्थानाद् बहिष्ठानि पूर्वादौ स्थापयेत्क्रमात्। स्वर्णेन शालिं रूप्येण व्रीहिं चायसकोद्रवम् ।।११८।। ब्रह्मस्थान के बाहर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर दिशा में सुवर्ण के साथ शालिधान्य, चाँदी के साथ व्रीहि, अयस के साथ कोद्रव ( कोदो ) रखना चाहिये।।११८।। त्रपुकङ्कं सीसमाषं तिलं वैकृन्तकल्पितम्। मुद्गं चायोमयं ताम्रं कुलत्थमिति लोहजान् ।।११९।।