भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६९ उन्नतं तावदेवं स्याद्वृत्तं स्याच्चतुरस्रकम् । सपञ्चपञ्चकोष्ठं वा नवकोष्ठकमेव वा ॥१०६॥ ताम्रपात्र की ऊँचाई उसकी चौड़ाई के समान होनी चाहिये। उसमें पच्चीस अथवा नौ कोष्ठ होने चाहिये ।।१०६।। उपपीठपदे देवास्तस्मिन् पात्रे तु सम्मताः । रजतेन वृषः सूर्ये वज्री हाटकनिर्मितः ॥१०७॥ उपपीठ पद से युक्त (पच्चीस कोष्ठ वाले) उस पात्र में वास्तुदेवों को स्थान देना चाहिये। सूर्य के कोष्ठ में रजतनिर्मित वृष एवं सुवर्णनिर्मित इन्द्र को स्थापित करना चाहिये ।।१०७।। यमे तु यमराजश्च शुल्बेनायसवारणः । हैमः सिंहस्तु रूप्येण वरुणे सजलाधिपः ॥१०८॥ यम के पद पर ताम्रनिर्मित यमराज, लौहनिर्मित सिंह एवं रजतनिर्मित वरुण को स्थापित करना चाहिये ।।१०८।। वाजी श्वेतमयः सोमे राजतो द्विजराजकः । ईशे वैकृन्तमनले त्रपु सीसं तु नैर्ऋते ॥१०९॥ सोम के पद पर श्वेत वर्ण का (रजतमय) अश्व तथा रजतनिर्मित गज रखना चाहिये। ईश के पद पर पारा, अग्नि पर टिन, निर्ऋति पर सीसा रखना चाहिये ।।१०९।। स्वर्णं समीरणे जातिहिङ्गुल्यं तु जयन्तके । हरितालं भृशे भागे वितथे तु मनःशिला ॥११०॥ समीरण के पद पर सुवर्ण, जयन्त पर सिन्दूर, भृश पर हरिताल तथा वितथ पर मनःशिला (मैनसिल) रखना चाहिये ।।११०।। माक्षिकं भृङ्गराजे स्याद्राजावर्तं सुकन्धरे । गैरिकं शोषभागे तु गणमुख्येऽञ्जनं भवेत् ॥१११॥ भृङ्गराज पर माक्षिक (एक खनिज पदार्थ), सुकन्धर पर लाजावर्त, शोष पर गैरिक (गेरु) तथा गणमुख्य पर अञ्जन रखना चाहिये ।।१११।। अदितौ दरदं विद्यादेवमेव न्यसेत् क्रमात् । चतुष्पदे च लोकेशाः स्थाप्याश्चाभ्यन्तराननाः ॥११२॥ अदिति पर रक्त वर्ण का ताम्र रखना चाहिये। उपर्युक्त सभी को भली-भाँति जान कर क्रमानुसार रखना चाहिये। चतुष्पदों पर लोकनाथों को इस प्रकार स्थापित करना