मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७७ दण्डादिसप्तदण्डं यावद्दण्डार्धवॄद्ध्या तु। मार्गविशालाश्चैते त्रयोदशभेदाः समुद्दिष्टाः ॥१८॥ मार्गों का विस्तार एक दण्ड से प्रारम्भ कर आधा-आधा दण्ड बढ़ाते हुये सात दण्डपर्यन्त रखना चाहिये। इस प्रकार विस्तार की दृष्टि से मार्ग के तेरह भेद कहे गये हैं॥१८॥ ❊ राजधानी ❊ राष्ट्रस्य मध्यभागे सज्जनबहुले नदीसमीपे च। नगरं केवलमथवा राजगृहोपेतराजधानी वा ॥१९॥ राष्ट्र (राज्य) के मध्य भाग में, नदी के निकट, श्रेष्ठ लोगों की जनसंख्या जहाँ अधिक हो, ऐसा वसति-विन्यास केवल नगर होता है। उस नगर में यदि राजभवन हो तो उसे राजधानी कहते हैं॥१९॥ दिक्षु चतुर्द्वारयुतं गोपुरयुक्तं तु सालाढ्यम्। क्रयविक्रयकैर्युक्तं सर्वजनावाससङ्कीर्णम् ॥२०॥ चारो दिशाओं में चार द्वार से युक्त, द्वारों पर शालयुक्त गोपुर, क्रय-विक्रय के स्थानों (बाजार) से युक्त एवं सभी वर्णों के आवास से युक्त स्थान (नगर होता है)॥२०॥ सर्वसुरालयसहितं नगरमिदं केवलं प्रोक्तम्। प्रत्यगुदग्दिशि गहना परितः साला बहिः सपांसुचया ॥२१॥ सभी देवों के मन्दिर से युक्त स्थान को केवल नगर कहा गया है। (राजधानी के) पूर्व एवं उत्तर दिशा में गहरा होता है तथा बाहर चारो ओर गीली मिट्टी से निर्मित प्राकार होता है॥२१॥ परितः परिखा बाह्ये शिबिरयुतानेकमुखरक्षा। पूर्वायां दक्षिणतश्चाभिमुखा राजबलयुक्ता ॥२२॥ प्राकार-मण्डल के बाहर चारो ओर परिखा होती है। नगर (राजधानी) के रक्षार्थ शिविर होता है, जहाँ से प्रत्येक दिशा पर दृष्टि रक्खी जाती है। राज्य के प्रहरी सैनिक पूर्व एवं दक्षिण दिशा में मुख करके पहरा देते हैं॥२२॥ उन्नतगोपुरयुक्ता नानाविधमालिकोपेता। सर्वसुरालयसहिता नानागणिकान्विता बहुद्याना ॥२३॥ नगर में ऊँचे-ऊँचे गोपुर (प्रवेशद्वार) होते हैं, जिनमें अनेक मालिकायें होती हैं।