मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ मयमतम् इन पुरादिकों की लम्बाई इनकी चौड़ाई की दुगुनी, तीन चौथाई, आधी अथवा चतुर्थांश अधिक होती है। अथवा चौड़ाई का षष्ठांश या अष्टमांश अधिक लम्बाई रखनी चाहिये।।१२।। ✺ वप्रविधानम् ✺ चतुरस्रमायतास्रं वृत्तं वृत्तायतं च पुनः। स्याद् गोलवृत्तमेवं वप्राकारास्तु पञ्चैव ।।१३।। प्राकार-योजना—नगर का प्राकारमण्डल ( चारदिवारी ) पाँच प्रकार की होती है—चौकोर, आयताकार, वृत्ताकार, वृत्तायताकार ( लम्बाई लिये वृत्ताकार ) तथा गोलवृत्ताकार।।१३।। पङ्क्त्यष्टसप्तपञ्चकचतुरंशैस्तत्कृते विपुले। मुनिरसशरयुगशिखिभिर्भागैर्वप्रावधिः प्रोक्तः ।।१४।। प्राकार-मण्डल की लम्बाई दश, आठ, सात, पाँच एवं चार तथा चौड़ाई सात, छः, पाँच, चार एवं तीन रखनी चाहिये।।१४।। द्वित्रिचतुर्हस्तं स्याद्विपुलं सालस्य तुङ्गे तु। सप्तदशैकादशभिर्हस्तैरग्रं तु त्र्यंशोनम् ।।१५।। परितः परिखा बाह्येऽबाह्ये देवालयादीनि। वप्र के मूल का विस्तार दो, तीन या चार हस्त तथा ऊँचाई सात, दश या ग्यारह हस्त रखना चाहिये। इसके ऊर्ध्व भाग का विस्तार मूल से तीन भाग कम होना चाहिये। देवालय आदि के बाहर एवं भीतर परिखा ( जलयुक्त खाई ) होनी चाहिये।।१५।। ✺ वर्ज्यस्थानानि ✺ पेचकभागाद्यासनभागान्तं चण्डितं प्रोक्तम् ।।१६।। सूत्रादीन्यथ विषमस्थानानि च वर्जयेन्मतिमान्। त्याज्य स्थान—पेचक वास्तु-विन्यास ( चार पद वास्तु ) या आसन वास्तु- विन्यास ( एक सौ पद वास्तु ) अथवा इन दोनों के मध्य आने वाले वास्तु-विन्यासों में से किसी का प्रयोग किया जा सकता है। बुद्धिमान व्यक्ति को निर्माण करते समय वास्तु के सूत्रादिकों एवं विषम स्थलों का परित्याग करना चाहिये।।१६।। ✺ मार्गाः ✺ प्रागुदगग्रं मार्गं तत्र यथेष्टं न्यसेद्विधिना ।।१७।। वहाँ मार्ग की योजना इच्छानुसार विधिपूर्वक पूर्व तथा उत्तर से प्रारम्भ करते हुये करनी चाहिये।।१७।।