मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ७५ तस्मात् त्रिराष्टवृद्ध्या द्रोणमुखे पञ्चधा मानम् । षण्णवतिचतुःशतकं यावत्तावत्तु विस्तारम् ॥१६॥ उससे ( चार सौ दण्ड से ) चौबीस-चौबीस दण्ड की वृद्धि करते हुये चार सौ छियानबे दण्डपर्यन्त द्रोणमुख वास्तु के पाँच प्रकार बनते हैं। ये इनके विस्तारमान कहे गये हैं।।१६।। द्विशतादिचतुःशतकं यावत्पञ्चाशदभिवृद्ध्या । पञ्चप्रमाणमेवं खर्वटविस्तार उद्दिष्टः ॥१७॥ दो सौ दण्ड से प्रारम्भ करते हुये पचास-पचास दण्ड की क्रमशः वृद्धि चार सौ दण्डपर्यन्त की जाती है। इस प्रकार खर्वट के विस्तार के पाँच प्रमाणभेद प्राप्त होते हैं।।१७।। द्विशतादिपङ्क्तिवृद्ध्या चत्वारिंशत्त्रिशतदण्डं स्यात् । यावन्निगमे विपुलाः प्रोक्तास्त्रिःपञ्चभेदाश्च ॥१८॥ दो सौ से प्रारम्भ कर दश-दश दण्ड की वृद्धि करते हुये तीन सौ चालीस दण्डपर्यन्त निगम के विस्तार का मान प्राप्त होता है। विस्तारमान की दृष्टि से इसके पन्द्रह भेद बनते हैं।।१८।। शतदण्डे शतवृद्ध्या पञ्चशतं यावदुद्दिष्टम् । स्यात् कोत्मकोलकानां विपुलं पञ्चैव भेदेन ॥१९॥ शत दण्ड से प्रारम्भ कर एक-एक सौ दण्ड की वृद्धि करते हुये पाँच सौ पर्यन्त कोत्मकोलक का विस्तार रखा जाता है। विस्तारमान की दृष्टि से इसके पाँच भेद होते हैं।।१९।। तावन्मानं प्रोक्तं पुरविपुले सूरिभिः प्राज्ञैः । यावत्पञ्चशतान्तं त्रिशतादारभ्य सप्तधा मानम् ॥ १२०॥ पञ्चाशद्धनुवृद्ध्या विपुलं कथितं विडम्बस्य । प्रागुपदिष्टं मानं ह्येतन्मानं तु वै तेषाम् ॥१२१॥ विद्वान् मनीषियों ने पुरों के विस्तार के प्रमाणों का इस प्रकार वर्णन किया है। विडम्ब का विस्तार-मान तीन सौ दण्ड से प्रारम्भ कर पचास-पचास दण्ड की वृद्धि करते हुये पाँच सौ दण्डपर्यन्त होता है। इसके प्रमाण की दृष्टि से सात भेद बनते हैं। पूर्ववर्णित मान ही इनका ( समानुपातिक ) मान होता है।।१२०-१२१।। द्विगुणं त्रिपादमर्धं पादं तेषां मुखायतं विपुलात् । विपुले तु षडष्टांशे भागेनैकेन वायतं पुरतः ॥१२२॥