भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अथ दशमोऽध्यायः ( नगरविधानम् ) नगरादीनां मानं विन्यासञ्च क्रमादहं वक्ष्ये । नगर-योजना—मैं नगर आदि के प्रमाण एवं विन्यास का क्रमानुसार वर्णन करता हूँ। ✵ नगरमानम् ✵ आद्यं धनुषां त्रिशतं तस्माच्छतदण्डवर्धनादुपरि ॥१॥ साष्टकसप्ततिभेदाश्चाष्टसहस्रान्तकं यावत् । नगराणां विपुलं हि प्रोक्तं पूर्वोक्तमानेन ॥२॥ नगरों का प्रमाण—नगर का प्रमाण तीन सौ धनुष से प्रारम्भ होकर एक-एक सौ दण्ड की वृद्धि करते हुये आठ हजार दण्ड तक प्राप्त होता है। इसके अठहत्तर भेद बनते हैं। इस प्रकार नगरों के विस्तार का प्रमाण प्राप्त होता है।।१-२।। शतदण्डादिदशवृद्ध्या त्रिःसप्तत्रिशतदण्डान्तम् । क्षुद्राणामिदमुदितं नगराणामेव सर्वेषाम् ॥३॥ एक सौ दण्ड से प्रारम्भ कर दश-दश दण्ड की वृद्धि करते हुये तीन सौ दण्ड- पर्यन्त सभी क्षुद्र नगरों के इक्कीस विस्तार-प्रमाण प्राप्त होते हैं।।३।। उत्कृष्टपुरपरिधिर्नृपतेर्यष्टिद्विरष्टसाहस्रैः । चातुःसहस्रकान्तं पञ्चशतोनाद्धि पञ्चपञ्चधा मानम् ॥४॥ राजाओं के उत्तम पुरों की परिधि का प्रमाण सोलह हजार यष्टिप्रमाण से प्रारम्भ कर पाँच सौ दण्ड कम करते हुये चार हजार पर्यन्त कहा गया है। इस प्रकार इनके पच्चीस प्रमाणभेद बनते हैं।।४।। त्रिशतादिचतुःशतकं यावद्वृद्ध्या तु विंशतिभिः । षड्विधमुक्तं खेटं श्रेष्ठे मध्ये परे विपुलम् ॥५॥ तीन सौ दण्ड से प्रारम्भ कर बीस-बीस दण्ड की वृद्धि करते समय चार सौ दण्डपर्यन्त खेट के छः प्रकार के भेद वर्णित हैं। इनमें दो श्रेष्ठ, दो मध्यम एवं दो कनिष्ठ प्रकार के खेट होते हैं।।५।।