मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ मयमतम् अन्य श्रेणी के भवन-स्थान— (पुर तथा ग्राम आदि के ) दक्षिण ओर गोशाला एवं उत्तर में पुष्पवाटिका होनी चाहिये। पूर्व या पश्चिम द्वार के निकट तपस्वियों का आवास होना चाहिये।।८७।। सर्वत्रैव जलाशयमिष्टं वापी च कूपञ्च। वैश्यानां दक्षिणतः परितः सदनं तु शूद्राणाम् ।।८८।। जलाशय, वापी एवं कूप सभी स्थानों पर होना चाहिये। वैश्यों का आवास दक्षिण में एवं शूद्रों का आवास चारो ओर होना चाहिये।।८८।। प्राच्यां वाऽप्युत्तरतो गेहं कुर्यात् कुलालानाम्। तत्रैव नापितानामन्यत्कर्मोपयुक्तानाम् ।।८९।। पूर्व अथवा उत्तर दिशा में कुम्हारों के गृह होने चाहिये। वहीं नाइयों का एवं अन्य हस्तकौशल वालों के भी गृह होने चाहिये।।८९।। मत्स्योपजीविनां स्याद्वासं वायव्यदेशे तु। पश्चिमदेशे मांसैरुपवृत्तीनां निवासः स्यात् ।।९०।। उत्तर-पश्चिम दिशा में मछुआरों का निवास होना चाहिये। पश्चिमी क्षेत्र में मांस से आजीविका चलाने वालों का निवास होना चाहिये।।९०।। तैलोपजीविनां चैवोत्तरदेशे गृहश्रेणिः। तेलियों के गृह उत्तर दिशा में होने चाहिये। ✺ गृहलक्षणम् ✺ धनुभिस्त्रिपञ्चसप्तभिरथ नवभिर्गृहावधिः प्रोक्तः ।।९१।। गृह के लक्षण—गृहों की चौड़ाई तीन, पाँच, सात या नौ धनुप्रमाण होनी चाहिये।।९१।। दण्डाभ्यामथ तस्मादायामं वर्धयेत् क्रमशः। व्यासद्विगुणावधिकं यावद् दैर्घ्यं गृहीतव्यम् ।।९२।। गृहों की लम्बाई चौड़ाई से क्रमशः दो-दो दण्ड बढ़ानी चाहिये। लम्बाई उतनी ही ग्रहण करनी चाहिये, जितनी कि चौड़ाई की दुगुनी से अधिक न हो जाय।।९२।। तत्रैव हस्तमानैर्गेहं कुर्याद् यथाविधिना। रुचकः स्वस्तिकमथवा नन्द्यावर्त्तञ्च सर्वतोभद्रम् ।।९३।। गृहों का निर्माण विधि के अनुसार हस्तप्रमाण से करना चाहिये। ये गृह रुचक, स्वस्तिक, नन्द्यावर्त और सर्वतोभद्र (किसी एक शैली के ) हो सकते हैं।।९३।।