मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६७ स्याद् वर्धमानमेषामाकृत्या तच्चतुर्गृहं प्रोक्तम्। दण्डकशालालाङ्गलमथवा शूर्पं यथेष्टं स्यात् ।।९४।। गृह ( सर्वतोभद्र या ) वर्धमान हो सकता है। आकृति की दृष्टि से ये चार गृह कहे गये हैं। अथवा दण्डक, लाङ्गल या शूर्प गृह इच्छानुसार हो सकते हैं।।९४।। ग्रामात् किञ्चिद्दूरे पावकदेशेऽथवा वायौ। वासः स्यात्स्थपतीनां शेषाणां तत्र कर्तव्यम् ।।९५।। ग्राम से कुछ दूरं आग्नेय अथवा वायव्य कोण में स्थपतियों का आवास होना चाहिये। शेष का आवास भी वहीं बनवाना चाहिये।।९५।। तस्मात् किञ्चिद्दूरे रजकादीनां निवासः स्यात्। चण्डालकुटीराणि पूर्वायां क्रोशमात्रे तु ।।९६।। उससे कुछ दूर रजक ( धोबी ) आदि का आवास होना चाहिये। ग्राम से पूर्व दिशा में एक कोस की दूरी पर चण्डाल वर्ग का आवास होना चाहिये ।।९६।। चण्डालयोषितस्तास्ताम्रायःसीसभूषणाः सर्वाः। पूर्वाह्ने मलमोक्षक्रियोचिता ग्राममावेश्य ।।९७।। वहाँ चण्डाल-स्त्रियाँ ताम्र, अयस् एवं सीसे के आभूषण पहने हुये निवास करें। दिन के प्रथम प्रहर में ग्राम में प्रवेश कर चण्डाल वर्ग ग्राम की गन्दगी साफ करें।।९७।। प्रागुत्तरदिशि दण्डैः पञ्चशतैः स्याच्छवावासम्। शेषाणामपि तत्तदूरे देशे श्मशानं स्यात् ।।९८।। पूर्वोत्तर दिशा में ग्राम से पाँच सौ दण्ड दूर शवों ( की अन्त्येष्टि क्रिया ) का स्थान होना चाहिये। शेष लोगों ( सामान्य जनों से पृथक् ) का श्मशान उससे दूर होना चाहिये।।९८।। ✹ विन्यासदोषाः ✹ चण्डालचर्मकारश्मशानतोयाशयापयानञ्च । देवगृहविश्वकोष्ठग्रामावृतदेशमार्गपरिवृत्तिः ।।९९।। भवन-विन्यास के दोष—चण्डाल एवं चर्मकार का आवास, श्मशान, जलाशय, देवालय, विश्वकोष्ठ ( सभी पदार्थों का संग्रहस्थल ), ग्राम के चारो ओर का परिवेश एवं ग्राम के चारो ओर के मार्ग यदि उचित स्थान पर नहीं होते हैं ( तो उनका परिणाम कष्टकर होता है )।।९९।।