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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 395 में से

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नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६३ भृशभागे मृगांशे तु नैर्ऋत्यां केशवालयम्। सुग्रीवांशे गणाध्यक्षः पुष्पदन्तपदेऽपि वा ॥६८॥ भृश, मृग या नैर्ऋत्य स्थान पर केशव का मन्दिर होना चाहिये। सुग्रीव के पद पर या पुष्पदन्त के पद पर गणाध्यक्ष ( गणेश ) का मन्दिर होना चाहिये।।६८।। आर्यकभवनं निर्ऋते वरुणे विष्णोर्विमानं स्यात्। स्थानकमासनशयनं धाम्येतास्मिन् क्रमेण चोर्ध्वतलात् ॥६९॥ आर्यक का भवन नैर्ऋत्य कोण में एवं विष्णु का विमान ( देवालय ) वरुण के पद पर होना चाहिये। मन्दिर में ऊपरी तल से क्रमशः विष्णु की स्थानक ( खड़ी ), आसन ( बैठी ) एवं शयन प्रतिमा होनी चाहिये।।६९।। अथवा मूलतलं घनमुपरितले स्थानकं प्रोक्तम्। सुगतालयमथ सुगले भृङ्गनृपे चैव जिनधाम ॥७०॥ अथवा भूतल पर बड़ी एवं भारी तथा ऊपरी तल पर स्थानक मुद्रा में विष्णुप्रतिमा होनी चाहिये। सुगल के पद पर सुगत ( बुद्ध ) की प्रतिमा एवं भृङ्गराज के पद पर जिन-देवालय होना चाहिये।।७०।। मदिरालयमथ वायौ मुख्ये कात्यायनीवासः । सोमे धनगृहं वा मातृणामालयं तत्र ॥७१॥ वायु के पद पर मदिरा का मन्दिर, मुख्य के पद पर कात्यायनी का मन्दिर, सोम के पद पर धनद ( कुबेर ) का मन्दिर अथवा मातृदेवियों का मन्दिर होना चाहिये।।७१।। ईशे शङ्करभवनं पर्जन्यांशे जयन्ते वा। सोमे धनदगृहं वा शोषपदे वा विधातव्यम् ॥७२॥ शिवालय ईश, पर्जन्य या जयन्त के पद पर, कुबेर का मन्दिर सोम अथवा शोष के पद पर निर्मित कराना चाहिये।।७२।। तत्र गजाननभवनं ह्यादितौ वा मातृकोष्ठं स्यात्। मध्ये विष्णोर्धिष्ण्यं तत्र सभामण्डपं प्रोक्तम् ॥७३॥ वहीं गणेश का भवन होना चाहिये। अथवा अदिति के पद पर मातृदेवियों का मन्दिर होना चाहिये। मध्य में विष्णु का मन्दिर होना चाहिये। वहीं सभामण्डप भी होना चाहिये—ऐसा कहा गया है।।७३।। ब्रह्मस्थानैशाने वाग्नेय्यां वा सभास्थानम्। तदुदक्पश्चिमभागे हरिसदनं दक्षिणे परतः ॥७४॥

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