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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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६४ मयमतम् अथवा सभास्थल ब्रह्मा के पद पर ईशान कोण या आग्नेय कोण में होना चाहिये। विष्णुमन्दिर उत्तर-पश्चिम में अथवा दक्षिण में होना चाहिये।।७४।। क्रूरसमेतं कर्म प्रत्ययमथ पञ्च मध्ये तु। युग्मायुग्मपदे च ब्रह्मस्थानेऽष्टनवभागे ।।७५।। मध्य के पाँच पदों पर निर्माणकार्य दुःखकारक होता है। वास्तुमण्डल के युग्म पद से तथा अयुग्म पद (समसंख्या एवं विषमसंख्या) से निर्मित होने पर ब्रह्मस्थान आठ भाग एवं नौ भाग से निर्मित होना चाहिये।।७५।। व्यपनीयाजं भागं प्रागादिषु दिक्षु च क्रमशः। नलिनकभवनं स्वस्तिकनन्द्यावर्त्तौ प्रलीनकं चैव ।।७६।। यच्छ्रीप्रतिष्ठिताख्यं चतुर्मुखहर्म्यं तु पद्मसमम्। विष्णुच्छन्दविमानं त्रितलाद्द्वादशतलान्तम् ।।७७।। ब्रह्मा के भाग को छोड़ कर पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर क्रमशः नलिनक, स्वस्तिक, नन्द्यावर्त, प्रलीनक, श्रीप्रतिष्ठित, चतुर्मुख एवं पद्मसम भवन का निर्माण करना चाहिये। वहाँ तीन तल से लेकर बारह तलपर्यन्त विष्णुच्छन्द विमान का निर्माण होना चाहिये। बहिरप्येवं सौधं ग्रामादिषु तत्र विज्ञेयम्। स्थितमासीनं शयनं यत्र यदिष्टं तु तत्र तत्स्थाप्यम् ।।७८।। यह विष्णुमन्दिर ग्रामादि से बाहर भी हो सकता है। इसमें विष्णु की खड़ी, बैठी या शयन करती हुई मूर्ति स्थापित करनी चाहिये।।७८।। उत्कृष्टमध्यमाधमनीचादिकं क्रमेणैवम्। भवनं ग्रामेषूदितमिति नीचं चोत्तमे न स्यात् ।।७९।। ग्रामों में क्रमानुसार उत्कृष्ट, मध्यम, अधम एवं नीच आदि भवन होने चाहिये; किन्तु उत्तम ग्राम में नीच भवन नहीं होना चाहिये।।७९।। क्षुद्रे क्षुद्रविमानं यद्यत्रैवोचितं विधातव्यम्। त्रिचतुष्पञ्चतलं तद्धीने हीने च सामान्यम् ।।८०।। यदि ग्राम क्षुद्र हो तो वहाँ क्षुद्र विमान (छोटा मन्दिर) ही उचित है एवं वही बनाना चाहिये। तीन, चार एवं पाँच तल का देवालय हीन ग्राम में होना चाहिये तथा हीन ग्राम में सामान्य भवन होना चाहिये।।८०।। ग्रामे वा नगरे वोत्कृष्टे देवालयं तु नीचं चेत्। नीचा भवन्ति पुरुषाः स्त्रियोऽपि दुःशीलतां यान्ति ।।८१।।