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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

४. अध्याय २६-३६: मण्डप, प्राकार, परिवार-देवता मन्दिर एवं प्रतिष्ठा उपसंहार

द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७७ तदधः सार्धसप्तांशैः सत्रिपादगुणांशकैः । स्तम्भं च तलकं कुर्यात्तारेऽंशं तत्र पूर्ववत् ॥६२॥ एवं नवतलं प्रोक्तं दशभौममथोच्यते । उसके ऊपरी तल ( नौ तल ) में निचले तल से ऊपर साढ़े सात भाग से स्तम्भ एवं पौने चार भाग से तल ( अधिष्ठान ) बनाना चाहिये। तल का विस्तार पूर्ववत् होना चाहिये। इस प्रकार नौ तल का मन्दिर निर्मित होता है। अब दशवें तल का वर्णन किया जा रहा है॥६२॥ तदधोऽष्टयुगांशैस्तु पादं मसूरकं भवेत् ॥६३॥ तारे पूर्वोक्तभागैस्तु मनुभागैरथापि वा। (दसवें तल के लिये ) निचले तल के ऊपर आठ भाग से पाद ( स्तम्भ, तल की ऊँचाई ) एवं चार भाग से मसूरक होता है। चौड़ाई पूर्वोक्त रीति से या चौदह भाग में बाँटनी चाहिये॥६३॥ तदधः सार्धवस्वंशैः सपादयुगभागिकैः ॥६४॥ स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे तद्वच्च पक्षकैः । तथा द्विरष्टभागैस्तु सप्तदशांशकैस्तु वा ॥६५॥ एकादशतलं प्रोक्तं द्वादशं क्षममुच्यते । इसके ऊपरी तल ( ग्यारह तल ) में निचले तल के ऊपर साढ़े आठ भाग से स्तम्भ एवं सवा चार से मसूरक निर्मित करना चाहिये। चौड़ाई पूर्ववर्णित अथवा पन्द्रह, सोलह या सत्रह भागों में बाँटनी चाहिये। इस प्रकार ग्यारह तल का देवालय निर्मित होता है। अब बारह तल के देवालय का वर्णन किया जा रहा है॥६४-६५॥ ❋ द्वादशतलविधानम् ❋ तदधो नन्दनन्दार्धभागैः स्तम्भं मसूरकम् ॥६६॥ तारे द्विरष्टभागादि यावदर्कद्वयांशकम् । गृहपिण्ड्यलिन्द्रहारा गर्भागाराद्वहिः क्रमात् ॥६७॥ हर्म्यस्यावधिकं यावन्नीयते तावदंशकैः । द्वित्रिवेदैषु षड्भागैः प्रागुक्तांशैस्तु वा गृहम् ॥६८॥ बारह तल के देवालय का विधान—( बारह तल के देवालय के लिये ) निचले तल ( की भूमि ) के नौ भाग करने चाहिये। साढ़े चार भाग से मसूरक होने चाहिये। चौड़ाई को सोलह से चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। गर्भगृह से लेकर भवन

२७८ मयमतम् की सीमा तक क्रमशः गृहपिण्ड ( भित्ति ), अलिन्द्र एवं हारामार्ग को उनके भाग के अनुसार रखना चाहिये। गर्भगृह दो, तीन, चार या छः भाग से या पूर्वोक्त भाग से निर्मित करना चाहिये।।६६-६८।। एकार्धेनाथवालिन्द्रं शेषं कुड्येषु योजयेत्। केचित् त्रिनवभिर्भागैर्वदन्ति द्वादशावनौ ।।६९।। षट्कुड्यं पञ्चसालिन्द्रं बहिः कूटादिशोभितम्। कूटं कोष्ठं च नीडं च क्षुद्रशालेभतुण्डकम् ।।७०।। अलिन्द्र की संरचना एक या डेढ़ भाग से करनी चाहिये एवं शेष भाग से भित्ति निर्मित होनी चाहिये। कुछ विद्वानों के अनुसार बारहवें तल के सत्ताईस भाग करने चाहिये। छः भाग से भित्ति एवं पाँच भाग से अलिन्द्र निर्मित होना चाहिये। बाहरी भाग में कूटादि से अलङ्करण होना चाहिये। वहाँ कूट, कोष्ठ, नीड, क्षुद्र-शाल एवं गज- शुण्ड निर्मित होना चाहिये।।६९-७०।। यथाशोभमलङ्कारं तथा युञ्जीत बुद्धिमान्। युग्महस्तैरयुग्मैर्वा योजयेदेवमिच्छया ।।७१।। इन अलङ्करणों को इस प्रकार निर्मित करना चाहिये, जिससे वे सुन्दर लगें। इन्हें सम-हस्तप्रमाण से या विषम-हस्तप्रमाण से निर्मित करना चाहिये।।७१।। युग्मांशे द्व्यंशकं वाऽपि कूटव्यासं द्विरायतम्। शालायाश्चतुरंशैर्वा युग्मे युग्मांशकैर्विदुः ।।७२।। नानाभागैरलङ्कारैरन्यैरुक्तं मुनीश्वरैः। तथा वा तत्र युञ्जीयात्प्राज्ञः शिल्पिषु बुद्धिमान् ।।७३।। यदि प्रमाण सम संख्या में हों तो कूट का व्यास दो भाग से एवं चौड़ाई उसके दुगुनी रखनी चाहिये। अथवा शाला (कूट) की चौड़ाई चार भाग से रखनी चाहिये। सम संख्या का माप होने पर सभी भागों का माप सम संख्या में होना चाहिये। श्रेष्ठ मुनियों ने विभिन्न भागों एवं अलङ्करणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान शिल्पी को उन स्थानों पर उसी विधि से निर्माण करना चाहिये।।७२-७३।। ✺ खण्डहर्म्यम् ✺ तलमेकं भवेद् ग्रासं खण्डहर्म्यं चतुःस्थले। द्वितलं पञ्चषट्सप्तभूमावेव विधीयते ।।७४।। त्रितलं चाष्टभूमे तु नन्दपङ्क्तितले तथा। पञ्चभौमं चतुर्भौमं द्वादशैकादशे तले ।।७५।।

द्वांविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७९ खण्डहर्म्य में यदि देवालय चार तल का हो तो प्रथम तल की ऊँचाई पर ग्रास ( निर्माण का एक विशिष्ट अङ्ग ) होना चाहिये। यदि भवन पाँच, छः या सात तल का हो तो दूसरे तल की ऊँचाई पर; यदि भवन आठ, नौ या दश तल का हो तो तीसरे तल पर; यदि ग्यारह तल का भवन हो तो ग्रास चौथे तल पर तथा बारह तल वाले भवन में पाँचवें तल पर निर्मित होना चाहिये।।७४-७५।। ✱ कूटकोष्ठादि ✱ मूलतः कूटकोष्ठादीन् यः कर्तुं सम्यगीहते। तले तले विभागांश्च यथायुक्त्या प्रयोजयेत् ॥७६॥ कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गमपर्युपरि पूर्ववत्। कूटकोष्ठकनीडाद्यैर्भेदैराख्या यथोदिता ॥७७॥ जो व्यक्ति प्रथम तल से कूट-कोष्ठ आदि का उचित रीति से निर्माण करना चाहता है, उसे प्रत्येक तल का विभाग नियमानुसार करना चाहिये। प्रत्येक ऊपरी तल में कूट-कोष्ठ आदि अङ्गों को पहले जिस प्रकार कहा गया है, उसी ढंग से निर्मित करना चाहिये। कूट, कोष्ठ एवं नीड आदि भेदों का वर्णन पहले किया जा चुका है।।७६-७७।। पूर्वं तैर्भेदकैर्युक्तस्याख्या धाम्नस्तथा भवेत्। आद्वादशतलादेवं युञ्जीयाद् द्वितलादितः ॥७८॥ कर्णे मध्ये तयोर्मध्ये कूटं कोष्ठं च पञ्जरम्। कर्तव्यं मानसूत्रात्तु तेषां निर्गममुच्यते ॥७९॥ ( कूटादि ) भेदों का जिस भवन में जिस प्रकार प्रयोग करना चाहिये, उसका वर्णन पहले किया जा चुका है। इनका प्रयोग दूसरे तल से प्रारम्भ कर बारह तलपर्यन्त करना चाहिये। भवन के कर्ण ( कोने ) पर कूट, मध्य भाग में कोष्ठ एवं कूट तथा कोष्ठ के मध्य में पञ्जर का निर्माण करना चाहिये। उनके निर्गम का निर्माण मानसूत्र से करना चाहिये।।७८-७९।। स्वव्यासाधं तथार्धार्धं दण्डं वा द्वित्रिदण्डकम्। अन्तर्विन्यासदेशं तु मानसूत्रं न योजयेत् ॥८०॥ ऋजुसूत्रप्रमाणान्तं तदङ्गे विपदां पदम्। तस्मात् कूटादिसर्वाङ्गं मानसूत्राद् बहिर्नयेत् ॥८१॥ निर्गमों का माप ( उस तल ) की चौड़ाई का आधा अथवा उसका भी आधा ( चौड़ाई का चौथाई भाग ) रखना चाहिये या उनका माप एक, दो अथवा तीन दण्ड

२८० मयमतम् होना चाहिये। इसके भीतरी भाग के माप के लिये मानसूत्र का प्रयोग नहीं करना चाहिये। ऋजुसूत्र माप के अन्त तक होता है। इसका बीच में भङ्ग होना विपत्तिकारक होता है; इसलिये कूट आदि सभी अङ्गों का निर्माण मानसूत्र से हटकर करना चाहिये।।८०-८१।। चतुरस्रं तु वस्वस्रं षोडशास्रं तु वर्तुलम्। मस्तकं स्तूपिकोपेतं कूटं कर्णयुतं मतम् ॥८२॥ मध्यनासिसमोपेतमर्धकोटिसमन्वितम् । मुखपट्टिकयोपेतं शक्तिध्वजसमायुतम् ॥८३॥ कर्ण पर निर्मित कूट का शीर्ष चौकोर, अष्टकोण, षोडशकोण अथवा गोलाकार एवं स्तूपिका से युक्त होता है। इसके मध्य भाग में नासि एवं अर्धकोटि निर्मित होता है। यह मुखपट्टिका एवं शक्तिध्वज से युक्त होता है।।८२-८३।। अनेकस्थूपिकोपेतं कोष्ठकं मध्यमे भवेत् । हस्तिपृष्ठनिभं पृष्ठे शालाकारं मुखं मुखे ॥८४॥ पञ्जरं विहितं कूटकोष्ठयोरन्तरे बुधैः । पार्श्ववक्त्रं तदेवेष्टं हस्तितुण्डं समण्डितम् ॥८५॥ अनेक स्तूपिकाओं से युक्त कोष्ठ मध्य में होना चाहिये। इसका पिछला भाग हाथी के पीठ की समान एवं अग्र भाग शाला के आकार का होना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ मध्यपञ्जर होना चाहिये। इसका मुख पार्श्व में होना चाहिये एवं गज-शुण्ड से सुसज्जित होना चाहिये।।८४-८५।। एष जातिक्रमः प्रोक्तः कर्णकोष्ठसमन्वितम् । मध्ये कूटं तयोर्मध्ये क्षुद्रकोष्ठादिशोभितम् ॥८६॥ छन्दमेतत् समुद्दिष्टं कूटं वा कोष्ठकं तु वा । अन्तरप्रस्तरोपेतान्निम्नं वोन्नतमेव वा ॥८७॥ विकल्पमिति निर्दिष्टमाभासं तद्विमिश्रितम् । क्षुद्रालपमध्यमोत्कृष्टं हर्म्याणामेवमीरितम् ॥८८॥ जात्यादिभेदकैर्युक्तं विमानं सम्पदां पदम् । विपरीते विनाशाय भवेदेवेति निश्चयः ॥८९॥ 'जाति' ( भवन का प्रकारविशेष ) का वर्णन इस प्रकार किया गया। ( छन्दभवन में ) भवन के कर्ण ( कोणों ) पर कोष्ठ, मध्य भाग में कूट तथा इन दोनों के मध्य

द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २८१ में क्षुद्रकोष्ठ आदि निर्मित हों तो उसे 'छन्द' कहा जाता है। (विकल्प भवन में) कूट या कोष्ठ अन्तर-प्रस्तर से युक्त हों, ऊँचे या नीचे हों तो उस भवन को 'विकल्प' कहा जाता है। 'आभास' भवन में इन दोनों व्यवस्थाओं के मिश्रित रूप का प्रयोग किया जाता है। यह छोटे, मध्यम एवं उत्तम श्रेणी के भवनों के अनुकूल होता है। 'जाति' आदि भेदों से युक्त देवालय सम्पत्ति प्रदान करते हैं। इसके विपरीत रीति से निर्मित देवालय विनाश के कारण बनते हैं॥८९॥ षडष्टास्रे च वृत्ते च द्व्यस्रवृत्ते च तत् क्रमात् । पञ्चाष्टनवपङ्क्त्यंशे व्यासैकांशेन बाह्यतः ॥९०॥ वर्तयेत्तु तदाकृत्या कोटिच्छेदार्थमीरितम् । चतुरस्रस्य नाहेन योजयेत्तु समं यथा ॥९१॥ तया वर्तनया तेषां मानं सम्पूर्णमिष्यते । मानं धाम्नस्तु सम्पूर्णं जगत्सम्पूर्णता भवेत् ॥९२॥ (कूट आदि के) षट्कोण, अष्टकोण, वृत्ताकार, द्व्यस्रवृत्ताकार (दो कोण एवं अगले सिरे पर गोलाई) होने पर उनके व्यास के क्रमशः पाँच, आठ, नौ एवं दश भाग करने चाहिये एवं एक भाग से उसके बाहर उसी की आकृति का घेरा बनाना चाहिये। यहाँ कोटि के छेद के लिये स्थान रक्खा जाता है। चौकोर के घेरे को इस प्रकार रखना चाहिये, जिससे माप सम बना रहे। उनकी वर्तनी से उनका (कूटादि का) मान पूर्ण होता है। यदि भवन का मान पूर्ण होता है तो संसार सम्पूर्णता को प्राप्त होता है (अर्थात् गृहकर्ता को समृद्धि एवं पूर्णता इस संसार में प्राप्त होती है)॥९०-९२॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कुर्यात् संलक्ष्य बुद्धिमान् । एवं संक्षेपतः प्रोक्तं प्रासादानां तु लक्षणम् ॥९३॥ एकादिद्वादशान्तं ह्युदयविपुलभागं करैस्तारमानं चोत्सेधं कूटकोष्ठाद्यवयवकरणं नाहभेदं क्रमेण । प्रोक्तं संक्षिप्य सम्यङ् मुनिभिरवितथैर्ब्रह्मपूर्वैर्यथोक्तं नानाभेदैर्विमानं प्रियतरमनघं तैतलानां मयेन ॥९४॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे चतुर्भूम्यादिबहुभूमि- विधानो नाम द्वाविंशोऽध्यायः इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति को प्रत्येक अङ्ग का निर्माण अत्यन्त सावधानीपूर्वक

२८२ मयमतम् करना चाहिये। इस प्रकार मन्दिरों का लक्षण संक्षेप में वर्णित किया गया। एक तल से लेकर बारह तल तक के भवन की ऊँचाई एवं चौड़ाई हस्त-मान से वर्णित की गई है। कूट एवं कोष्ठ आदि अङ्गों के भेदों का क्रमानुसार वर्णन किया गया। देवों के प्रिय एवं पवित्र विमानों एवं उनके विभिन्न भेदों का दोषहीन वर्णन जिस प्रकार प्राचीन ऋषियों ने किया, जिसका प्रथमतः ब्रह्मा ने उपदेश दिया, उसे संक्षिप्त करके मय ने यहाँ प्रस्तुत किया।।९३-९४।। व्याख्यात्मक टिप्पणी १. चार तल वाले भवन चार तल वाले भवनों का वर्णन मानसार ( अ. २२-३० ) एवं शिल्परत्न ( पूर्व. अ. ३७ ) में प्राप्त होता है २. मकरतोरण ( श्लोक ५० ) मकरतोरण का उल्लेख शिल्परत्न ( पू. अ.-२३.१२-१३ ) में प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है— पञ्चवक्त्रसमायुक्तं पार्श्वयोर्मकरास्यकम्। मध्ये पूरिमसंयुक्तं नानाचित्रसमन्वितम्।। नानालङ्कारसंयुक्तं यत्तन्मकरतोरणम्। देवद्विजनृपाणां तु शस्तं मकरतोरणम्।। यह तोरण देवालय एवं ब्राह्मणों के गृह के अनुकूल कहा गया है।

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः ( प्राकारपरिवारविधानम् ) ✵ तत्र प्राकारविधानम् ✵ रक्षार्थं च विमानानां शोभार्थं च तथाऽधुना । परिवारनिवेशार्थं प्राकारं प्रोच्यते बुधैः ॥१॥ चारदीवारी एवं सहायक देवपरिवार के स्थान का विधान—बुद्धिमान ऋषियों ने देवालय की रक्षा के लिये, शोभा के लिये एवं परिवार ( सहायक देव, सेवकवर्ग ) के लिये प्राकार का वर्णन जिस प्रकार किया गया है, उसका वर्णन अब किया जा रहा है॥१॥ ✵ प्राकारमानम् ✵ कृत्वा चतुष्पदं मूलप्रासादस्य तु विस्तृतम् । आद्यं सालं महापीठं पदैः षोडशभिर्युतम् ॥२॥ मण्डूकाख्यं द्वितीयं स्यान्मध्यं भद्रमहासनम् । चतुर्थं सुप्रतीकान्तं पञ्चमं चेन्द्रकान्तकम् ॥३॥ प्राकार का मान—प्रधान देवालय की चौड़ाई को चार पद में बाँटना चाहिये। प्रथम साल ( प्राकार ) की संज्ञा 'महापीठ' है एवं इसमें सोलह पद होते हैं। द्वितीय साल की संज्ञा 'मण्डूक' ( चौंसठ पद ), मध्य साल ( तृतीय ) की संज्ञा 'भद्रमहासन' ( एक सौ छत्तीस पद ), चतुर्थ 'सुप्रतीकान्त' ( चार सौ चौरासी पद ) एवं पाँचवें की संज्ञा 'इन्द्रकान्त' ( एक हजार चौबीस पद ) होती है ( ये पाँच प्रकार होते हैं )। एवं युग्मपदैर्युक्तमयुग्मैरथ वक्ष्यते । एकमाद्यं विमानं स्यादाद्यं सालं तु पीठकम् ॥४॥ द्वितीयं स्थण्डिलं सालं मध्यं चोभयचण्डितम् । सुसंहितं चतुर्थं स्यादीशकान्तं तु पञ्चमम् ॥५॥ ( उपर्युक्त प्राकारभेद ) युग्म संख्या वाले पदों के अनुसार वर्णित हैं। अब असम संख्या के अनुसार ( प्राकार ) वर्णन किया जा रहा है। विमान ( देवालय ) का मात्र एक पद होता है। प्रथम साल 'पीठ' ( नौ पद ), दूसरा 'स्थण्डिल' ( उनचास पद ),

२८४ मयमतम् मध्य साल ( तृतीय ) 'उभयचण्डित' ( एक सौ उनहत्तर पद ) संज्ञक, चौथा 'सुसंहित' ( चार सौ इकतालीस ) संज्ञक एवं पाँचवाँ 'ईशकान्त' ( नौ सौ इकसठ पद ) संज्ञक होता है।।४-५।। चतुरस्त्रीकृते तेन मुखायाममिहोर्ध्वतः । पादाधिकमथाध्यर्धं पादोनद्विगुणं क्रमात् ॥६॥ द्विगुणं द्विगुणार्धं च त्रिगुणं वा चतुर्गुणम् । मुखायाममिति प्रोक्तं प्राकाराणां विशेषतः ॥७॥ चतुष्कोण क्षेत्र के अग्र भाग की लम्बाई का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। यह लम्बाई ( मन्दिर के चौड़ाई की ) क्रमशः सवा, डेढ़, तीन चौथाई एवं दुगुनी होती है। प्राकारों के अग्र भाग की लम्बाई दुगुनी, ढाई गुनी, तीन गुनी या चार गुनी कही गई है।।६-७।। क्षुद्राणामल्पहर्म्याणां स्वव्यासार्धप्रमाणतः । अन्तर्मण्डलकं कुर्यात् सत्रिहस्तं तु तत्समम् ॥८॥ द्वितीयं हि तृतीयं तु तस्मात् पञ्चकराधिकम् । तस्मात् ससप्तहस्तं तु तत्समं स्याच्चतुर्थकम् ॥९॥ छोटे मन्दिरों में भी अत्यन्त छोटे मन्दिर की चौड़ाई के डेढ़ भाग की दूरी पर ( प्रथम प्राकार ) 'अन्तर्मण्डल', उसके आगे उतनी ही दूरी तीन हाथ पर दूसरा प्राकार, उससे पाँच हाथ दूरी पर तीसरा प्राकार, उससे सात हाथ की दूरी पर चौथा प्राकार एवं नौ हाथ की दूरी पर पाँचवाँ प्राकार होना चाहिये।।८-९।। नवहस्तसमायुक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् । मध्यमानां स्वतारार्धमन्तर्मण्डलमिष्यते ॥१०॥ तत्समं पञ्चहस्तेन संयुक्तं स्याद् द्वितीयकम् । सप्तहस्ताधिकं तस्मात् सालमुक्तं तृतीयकम् ॥११॥ नवहस्ताधिकं तस्माच्चतुर्थं सालमीरितम् । एकादशकरैर्युक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् ॥१२॥ ( छोटे मन्दिर के ) मध्यम कोटि के देवालय की चौड़ाई के आधे माप की दूरी पर अन्तरमण्डल की रचना की जाती है। दूसरा प्राकार पाँच हाथ की दूरी पर होता है। तीसरा साल ( प्राकार ) सात हाथ की दूरी पर, चतुर्थ साल नौ हाथ की दूरी पर एवं पाँचवाँ ग्यारह हाथ की दूरी पर होना चाहिये।।१०-१२।।

त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८५ उत्तमानां स्वतारार्धमाद्यं सालं प्रकीर्तितम् । तत्समं सप्तहस्तेन संयुक्तं स्याद् द्वितीयकम् ।।१३।। नवहस्ताधिकं तस्मात् तृतीयं सालमुच्यते । तस्मादेकादशाधिक्यं तत्समं तु चतुर्थकम् ।।१४।। त्रयोदशकरैर्युक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् । एवं क्षुद्राल्पमध्यानामुत्कृष्टानां प्रकीर्तितम् ।।१५।। (छोटे देवालयों के) उत्तम श्रेणी के देवालयों का प्रथम साल उसकी चौड़ाई के आधे माप की दूरी पर होना चाहिये। दूसरा साल सात हाथ की दूरी पर, तीसरा नौ हाथ की दूरी पर, चौथा ग्यारह हाथ की दूरी पर एवं पाँचवाँ तेरह हाथ की दूरी पर होना चाहिये। इस प्रकार अत्यन्त छोटे, क्षुद्र-मध्यम एवं क्षुद्र-उत्तम कोटि के देवालय के सालों (प्राकारों) का वर्णन किया गया।।१३-१५।। एतेन कारयेद् धीमान् पूर्वोक्तेन क्रमेण वा । प्राकारं परितस्तस्मान्मुखायामं तु पूर्ववत् ।।१६।। भित्त्यभ्यन्तरमानेन मानयेन्मानवित्तमः । भित्तिमध्येन बाह्येन कैश्चिदुक्तं तु सूरिभिः ।।१७।। बुद्धिमान व्यक्ति को इस विधि से या पूर्वोक्त क्रम से चारो ओर प्राकार की रचना करनी चाहिये। इसके मुखभाग की लम्बाई पूर्व-वर्णित रखनी चाहिये। माप के ज्ञाता भित्ति के भीतर से माप लेते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भित्ति के मध्य से एवं कुछ के अनुसार भित्ति के बाहर से माप लेना चाहिये।।१६-१७।। ✺ प्राकारभित्तिः ✺ अन्तर्मण्डलभित्तेश्च विष्कम्भं सार्धहस्तकम् । तस्मात् त्रित्र्यङ्गुलाधिक्याद् द्विहस्तान्तं यथाक्रमम् ।।१८।। पञ्चानामपि सालानां विष्कम्भं परिगृह्यताम् । तत्तद्विष्कम्भमानेन त्रिगुणं वा चतुर्गुणम् ।।१९।। प्राकारोदयमुद्दिष्टं स्वाष्टांशोनाग्रविस्तरम् । अन्तर्मण्डल की भित्ति का विष्कम्भ (मोटाई) डेढ़ हाथ होना चाहिये। इसके आगे के प्राकारों के विष्कम्भों का माप तीन-तीन अङ्गुल बढ़ाते हुये दो हाथ तक क्रमानुसार ले जाना चाहिये। पाँचों सालों (प्राकारों) का विष्कम्भ इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये। उनके विष्कम्भ-मान से उनकी ऊँचाई तीन गुनी या चार गुनी अधिक

२८६ मयमतम् होनी चाहिये। अग्र भाग ( ऊपरी भाग ) का विस्तार ( मूल से ) आठ भाग कम होना चाहिये।।१८-१९।। उत्तरान्तोचिता वाऽपि कुम्भमण्ड्यन्तकोदयाः ॥२०॥ मसूरकादिवर्गाढ्याः खण्डहर्म्याभिमण्डिताः । ऋजुभित्तियुता वाऽपि बुद्बुदार्धेन्दुशीर्षकाः ॥२१॥ प्राकार की ऊँचाई उत्तर के अन्त तक या ( स्तम्भ के ) कुम्भ या मण्डि तक रखनी चाहिये। प्राकार को मसूरक से युक्त एवं खण्डहर्म्य से सुसज्जित होना चाहिये। यह भित्ति सीधी हो अथवा बुद्बुद ( गोल सजावटी बिन्दु ) या अर्धचन्द्र उसके शीर्ष भाग पर सुसज्जित होना चाहिये।।२०-२१।। क्षुद्राल्पानां तु सालानां भित्तिर्हस्तप्रमाणतः । सार्धहस्ताद्विधार्यावत् पूर्ववद् वर्धयेत् क्रमात् ॥२२॥ ( छोटे देवालयों के ) सबसे छोटे मन्दिर के सालों की भित्ति ( प्राकारों की मोटाई ) हस्त-प्रमाण से होती है। इसे डेढ़ हाथ से प्रारम्भ होकर पूर्व-वर्णित रीति ( तीन-तीन अङ्गुल ) से क्रमानुसार बढ़ाना चाहिये।।२२।। सोत्तरा वाजनच्छत्रशीर्षाभाः सालभित्तयः । भित्तिव्याससमोत्तुङ्गं पादार्धाधिकमेव वा ॥२३॥ तदुच्चे रुद्रभागेऽप्यग्निमोक्षोऽक्षिशिवांशकैः । उत्तरं वाजनाब्जं च क्षेपणं च यथाक्रमम् ॥२४॥ ऋजुभित्तियुतं ह्येतत् खण्डहर्म्याभिमण्डितम् । अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं निर्गमोद्गमसंयुतम् ॥२५॥ प्राकार-शीर्ष उत्तर, वाजन एवं छत्र से युक्त होता है। इसकी ऊँचाई भित्ति की चौड़ाई के बराबर, सवा भाग या डेढ़ भाग अधिक होनी चाहिये। ऊँचाई को ग्यारह भागों में बाँटना चाहिये। तीन भाग से उत्तर, तीन भाग से वाजन, दो भाग से अब्ज एवं तीन भाग से क्षेपण की क्रमानुसार योजना करनी चाहिये। भित्ति ( का बाहरी भाग ) सीधा अथवा खण्डहर्म्य से युक्त हो सकता है। यह अधिष्ठान से प्रारम्भ होकर ( ऊँचाई पर ) निर्गम से युक्त होता है।।२३-२५।। ✳ आवृतमण्डपम् ✳ एकद्वित्रितलोपेतं कुर्यादावृतमण्डपम् । अभ्यन्तरे बहिष्ठात्तु ऋजुभित्तियुता भवेत् ॥२६॥

त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८७ अधोभूमित्रिभागे तु द्विभागं चोर्ध्वभूमिकम्। तत्पादाष्टांशहीनं वा बहिर्भित्त्युन्नतं भवेत् ॥२७॥ मालिकाकृतिरेवं वा महावारयुतं तु वा। भित्ति के भीतरी भाग में एक, दो या तीन तल से युक्त आवृतमण्डप का निर्माण करना चाहिये। भित्ति बाहर से सीधी होती है। निचले तल के तीन भाग में से दो भाग के बराबर ऊपरी तल का मान रखना चाहिये। अथवा यह चतुर्थांश या आठवाँ भाग हीन हो सकता है। या इसकी ऊँचाई बाहरी भित्ति के बराबर हो सकती है। यह मालिका की आकृति वाली या महावारं ( बड़ा बरामदा ) से युक्त होती है।।२६-२७।। मानान्तं बाह्यभित्त्युच्चमधो धूमेः स्थलान्तकम् ॥२८॥ मूलसङ्गोत्तरान्तं वा प्रस्तरान्तमथापि वा। खण्डहर्म्योत्तरान्तं वा शिखरान्तोन्नतं तु वा ॥२९॥ बाह्य भित्ति की सबसे अधिक ऊँचाई प्रधान देवालय की निचली भूमि के स्थल- भाग से उत्तर पर्यन्त, प्रस्तर तक, खण्डहर्म्य के उत्तर तक अथवा शिखर पर्यन्त हो सकती है।।२८-२९।। मण्डपं द्वितलं वैकतलं वाऽपि तदावृतम्। अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं समं वाष्टांशहीनकम् ॥३०॥ त्रिपादं वा विशेषेण सालाधिष्ठानतुङ्गतः। द्विगुणं चरणोत्तुङ्गं षडष्टांशोनमेव वा ॥३१॥ दो या एक तलयुक्त मण्डप ( देवालय ) के चारो ओर हो सकता है। यह अधिष्ठान से युक्त, उसके बराबर ऊँचा, आठ भाग कम या तीन चौथाई ऊँचा हो सकता है। मण्डप के स्तम्भ ( अधिष्ठान से ) दुगुने ऊँचे या ( दुगुने से ) आठ या छः भाग कम ऊँचे हो सकते हैं।।३०-३१।। ✹ सालशीर्षालङ्कारः ✹ उक्षं वा भूतरूपं वा कर्तव्यं सालशीर्षके। मूलजन्मतलं हस्तमात्रोच्चं जन्मसालातः ॥३२॥ प्राकार के शीर्षभाग के अलङ्करण—साल ( प्राकार ) के शीर्षभाग पर वृषभ या भूतों का स्वरूप अङ्कित करना चाहिये। मूल देव-भवन का जन्मतल ( अधिष्ठान ) साल के जन्म से एक हाथ ऊँचा रखना चाहिये।।३२।।

२८८ मयमतम् ✵ अधिष्ठानोत्सेधः ✵ प्रतिसालं तु षण्मात्रहीनं स्याच्छेषसालके । क्षुद्रे साष्टादशाङ्गुल्यं मध्यमे मूलपादुकम् ॥३३॥ क्षपयेत्तु चतुर्मात्रैर्यवत् पञ्चान्तसाल कम् । योजयेद् विधिनानेन स्थपतिस्तत्क्रमेण तु ॥३४॥ अधिष्ठान की ऊँचाई—क्षुद्र देवालय में शेष सालों में प्रत्येक साल छः-छः अङ्गुल कम होता जाता है। मध्यम देवालय में अठारह अङ्गुल का अन्तर होता है। प्रत्येक साल में (प्रथम से) पाँचवें तक चार-चार अङ्गुल कम होता जाता है। स्थपति को इसी विधि से साल-योजना करनी चाहिये।।३३-३४।। ✵ परिवारालयविधानम् ✵ परिवारविमानानां मानं गर्भार्धमिष्यते । मूलवस्तुत्रिभागैकं मध्यं वा पादबाह्यकम् ॥३५॥ त्रिचतुष्पञ्चषट्सप्तहस्तैर्वा हर्म्यविस्तृतम् । देव-परिवार के भवन का विधान—परिवार देवालय (प्रधान देव-मूर्ति से पृथक् देव-परिवार का मन्दिर, जो मन्दिर परिसर में बने होते हैं) के गर्भगृह का मान प्रधान देवालय के विस्तार का आधा होता है। इसे तीसरे भाग, आधा, तीन चौथाई के बराबर भी रक्खा जाता है। इस भवन का विस्तार तीन, चार, पाँच, छः या सात हाथ रखना चाहिये।।३५।। अष्टौ वा परिवाराः स्युस्तथा द्वादश षोडश ॥३६॥ द्वात्रिंशत् परिवाराश्च हीष्यन्ते शास्त्रकोविदैः । परिवारामरोत्सेधं युक्त्या तत्रैव योजयेत् ॥३७॥ यदुक्तं सकले बेरे तन्मानं गृह्यतां वरैः । सर्वलक्षणसंयुक्तं स्थानकासनमेव वा ॥३८॥ शास्त्र के ज्ञाताओं के अनुसार आठ, बारह, सोलह या बत्तीस परिवार-देवता होते हैं। परिवार-देवों की मूर्ति की ऊँचाई नियमानुसार होनी चाहिये। जो प्रमाण सकल बेरों (बेरों, पट्टियों पर निर्मित आकृति) के लिये कही गई है, वही प्रमाण श्रेष्ठ स्थपति को ग्रहण करना चाहिये। ये (मूर्तियाँ) सभी लक्षणों से युक्त बैठी या खड़ी मुद्रा में होनी चाहिये।।३६-३८।।

त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८९ ✵ अष्टौ परिवाराः ✵ हीनविमानानामथ परिवाराश्चाष्ट वै प्रोक्ताः। प्राकारोऽप्येकः स्यात् पीठपदे चार्यकादिषु वा ॥३९॥ ऋषभगणाधिपकमलजामातृगुहार्याच्युताश्च चण्डेशः। आठ परिवार-देवता--छोटे देवालयों में एक ही प्राकार एवं आठ परिवार- देवता होने चाहिये। यदि पीठ-संज्ञक वास्तु-पद हो तो आर्यक के पद से प्रारम्भ कर ऋषभ, गणाधिप, कमलजा ( लक्ष्मी ), मातृकायें, गुह, आर्य, अच्युत एवं चण्डेश होने चाहिये।।३९।। ✵ द्वादश परिवाराः ✵ उपपीठपदे चान्तर्द्वादश परिवाराः स्थाप्याः ॥४०॥ वृषकमलजगुहहरयः पूर्ववदुदितास्तथार्यकादिपदे। रविगजवदनयमास्ते मातृजलेशौ च दुर्गा च ॥४१॥ धनदश्चण्डः क्रमशः सूर्यपदाद्दिक्षुवामगताः। बारह परिवार-देवता-उपपीठ वास्तुपद पर बारह परिवार-देवताओं की स्थापना करनी चाहिये। पहले की भाँति आर्यक पद से प्रारम्भ कर वृष, कमलजा, गुह एवं हरि होने चाहिये। सूर्य के पद से दाहिनी ओर रवि, गजवदन, यम, मातृकायें, जलेश, दुर्गा, धनद एवं चण्ड क्रमानुसार होने चाहिये।।४०-४१।। ✵ षोडश परिवाराः ✵ षोडश परिवाराः स्युश्चोग्रे पीठे निधातव्याः ॥४२॥ अन्तश्चार्यकभागादिषु वृषभाद्यास्तथा प्राग्वत्। ईशपदे च जयन्ते भृशभागेऽग्नौ च वितथे च ॥४३॥ भृङ्गनृपे पितृसुगले शोषे वायौ च मुख्यकेऽप्युदितौ। चण्डश्चन्द्रः सूर्यो गजवदनः श्रीः सरस्वती चेति ॥४४॥ ता मातरश्च शुक्नो जीवो दुर्गा दितिस्तथाप्युदितिः। षोडश परिवार-देवता-उग्र पीठ-वास्तु पद पर सोलह देव-परिवार स्थापित करना चाहिये। आर्यक पद पर वृष आदि देवों को पहले के सदृश स्थापित करना चाहिये। ईश, जयन्त, भृश, अग्नि, वितथ, भृङ्गनृप, पितृ, सुगल, शोष, वायु, मुख्य एवं उदिति के पद पर क्रमशः चण्ड, चन्द्र, सूर्य, गजवदन, श्री, सरस्वती, मातृकायें, शुक्र, जीव, दुर्गा, दिति एवं उदिति होनी चाहिये।।४२-४४।। मय०-१९

२९० मयमतम् ✵ द्वात्रिंशत् परिवाराः ✵ द्वात्रिंशत्परिवाराः स्थण्डिलकाख्ये तु चण्डिते स्थाप्याः ॥४५॥ ब्रह्मपदं नवबाह्यो श्रीज्येष्ठोमा सरस्वती चैताः। साविन्द्रेन्द्रजयांशे रुद्रजये चापवत्से च ॥४६॥ आर्यादिषु च पदेषु वृषभाद्याः पूर्ववत् कथिताः । बत्तीस परिवार-देवता—स्थण्डिल वास्तुपद पर बत्तीस परिवारदेवता स्थापित किये जाते हैं। ब्रह्मा के पद के बाहर नौ पदों पर श्री, ज्येष्ठा, उमा एवं सरस्वती को क्रमशः साविन्द्र, इन्द्रजय, रुद्रजय एवं आपवत्स के पद पर रखना चाहिये। आर्यक आदि के पद पर वृषभ आदि देवों को पहले की भाँति स्थापित करना चाहिये। ईशे पर्जन्यपदे माहेन्द्रे भानुभागे तु ॥४७॥ सत्यान्तरिक्षकानलपूषगृहक्षतार्किभागे तु। गन्धर्वे मृषभागे पितृबोधनपुष्पदन्तवरुणेषु ॥४८॥ असुरे यक्षसमीरणभागे नागे च भल्लाटे । सोमपदे मृगभागेऽप्युदितौ देवाः क्रमात्स्थाप्याः ॥४९॥ ईशशशिनन्दिकेश्वरसुरपतयो वै महाकालः । निकरवह्निबृहस्पतिगजवदनयमाश्च भिङ्गिरिटिः ॥५०॥ चामुण्डाप्यथ निर्ऋतिश्चागस्त्यो विश्वकर्मा च। जलपतिरथ भृगुनामा दक्षः प्रजापतिर्वायुः ॥५१॥ दुर्गा च वीरभद्रो धनदश्चण्डेश्वरः शुक्रः । स्थण्डिलचण्डितभागे पण्डितजनमण्डलैरुदिताः ॥५२॥ ईश, पर्जन्य, महेन्द्र, सूर्य, सत्य, अन्तरिक्ष, अनल, पूषा, गृहक्षत, यम, गन्धर्व, मृष, पितृ, बोधन, पुष्पदन्त, वरुण, यक्ष, समीरण, नाग, भल्लाट, सोम, मृग एवं उदिति के पद पर क्रमशः देवों की स्थापना करनी चाहिये। (ये देवता हैं— ) ईश, शशि, नन्दिकेश्वर, सुरपति, महाकाल, दिनकर, वह्नि, बृहस्पति, गजवदन, यम, भृङ्गरीटि, चामुण्डा, निर्ऋति, अगस्त्य, विश्वकर्मा, जलपति, भृगु, दक्ष प्रजापति, वायु, दुर्गा, वीरभद्र, धनद, चण्डेश्वर एवं शुक्र। विद्वानों के कथनानुसार स्थण्डिल वास्तु-विभाग में यह व्यवस्था होनी चाहिये ।।४७-५२।। युग्मायुग्मपदे ते कुड्यगता वागताश्च परमध्ये । त्रिप्राकारे पञ्चप्राकारेऽप्येवमेव भवेत् ॥५३॥

त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९१ अष्टाद्याः परिवारा मध्यान्तर्हारयोरुदिताः । प्रत्यग्दिङ्मुखहर्म्ये मित्रे वृषभस्थितिः प्रोक्ता ॥५४॥ वास्तु-विन्यास सम पदों का हो अथवा विषम पदों का हो, परिवार-देवता प्राकार की भित्ति पर निर्मित होने चाहिये। उससे पृथक् होने की स्थिति में मध्य पद के पास होने चाहिये। जहाँ तीन अथवा पाँच प्राकार हों, वहाँ प्रारम्भिक आठ देवता मध्याहार या अन्ताहार पर निर्मित होने चाहिये। यदि देवालय पश्चिम-मुख हो तो मित्र के पद पर वृषभ की स्थिति होनी चाहिये॥५३-५४॥ कमलजगुहहरयस्ते भूधरभागार्ययोर्विवस्वति च । यन्मुखमीश्वरभवनं तन्मुखमेवोदितं तेषाम् ॥५५॥ शिष्टा हर्म्याभिमुखाः पूर्वोक्तपदे निधातव्याः । कमलज, गुह एवं हरि को भूधर, आर्य एवं विवस्वान् के पद पर होना चाहिये। जिस दिशा में ईश्वर के भवन का मुख हो, उसी दिशा में उनका भी मुख होना चाहिये। शेष देवों को पूर्ववर्णित पदों पर होना चाहिये एवं उनका मुख देवालय की ओर होना चाहिये॥५५॥ प्राक्प्रत्यङ्मुखमुक्षा देवाभिमुखो न वाऽभिमुखः ॥५६॥ अवागुत्तरदिशि मुखिनौ चण्डेशेभाननौ च मतौ । प्रासादमण्डपसभाशालाकाराणि कार्याणि ॥५७॥ परिवारविमानानि सर्वाण्यङ्गानि युक्तिवशात् । देवालय का मुख चाहे पूर्व दिशा में हो, चाहे पश्चिम में हो, वृष का मुख अथवा पृष्ठभाग शिव की ओर होना चाहिये। चण्डेश एवं गजानन का मुख क्रमशः दक्षिण एवं उत्तर की ओर होना चाहिये। देव-परिवार के भवन सभी अङ्गों से युक्त, उचित रीति से प्रासाद, मण्डप, सभा अथवा शाला के आकार का निर्मित करना चाहिये। ✺ मालिकापङ्क्तिः ✺ मध्यान्तर्हारयोरेव मालिकापङ्क्तिरिष्यते ॥५८॥ एकद्वित्रिचतुर्भूमिर्युक्ता वा पञ्चभूमिका । भित्तेरुपरि भित्तिः स्यात् पादः पादोपरि स्मृतः ॥५९॥ भित्तेरुपरि पादो वा पादोपरि न भित्तिका । कूटकोष्ठादियुक्ता वा जालभित्तिरलङ्कृता ॥६०॥ मण्डपाकृतियुक्ता वा शालाकारसभान्विता ।

२९२ मयमतम् मध्यहार एवं अन्तर्हार के बीच में मालिका-पङ्क्ति निर्मित होनी चाहिये। यह एक, दो, तीन, चार या पाँच तल की होनी चाहिये। दीवार के ऊपर दीवार एवं स्तम्भ के ऊपर स्तम्भ निर्मित होना चाहिये। भित्ति के ऊपर स्तम्भ निर्मित हो सकते हैं; किन्तु स्तम्भ के ऊपर भित्ति नहीं निर्मित होनी चाहिये। मालिका-पङ्क्ति को कूट एवं कोष्ठ आदि से युक्त एवं जालभित्ति से अलङ्कृत होना चाहिये। यह मण्डप के आकृति की, शाला या सभा के आकृति की होनी चाहिये ।।५८-६०।। भक्तिमानं तथा पादायामं संक्षिप्य वक्ष्यते ॥६१॥ मूलधाम्नस्तूत्तरान्तमुपानाद्युन्नतं क्रमात् । सप्तभागैः समं कृत्वा द्व्यंशं मसूरकोन्नतं ॥६२॥ पादायामं तु पञ्चांशं पादं सर्वाङ्गसंयुक्तम् । अथवा पादमानं तु नवभागैर्विभाजयेत् ॥६३॥ अधिष्ठानं द्विभागं स्याच्छेषं पादोदयं भवेत् । सार्धद्विहस्तमारभ्य षट्षडङ्गुलवर्धनात् ॥६४॥ षड्ढस्तान्तं समुत्सेधं स्तम्भं त्रिः पञ्चसंख्यया । भित्त्यभ्यन्तरतस्तावदेवं तस्या विशालता ॥६५॥ भक्त्यायामं च तावत् स्यात् क्षुद्रे महति मन्दिरे । षडङ्गुलात् समारभ्य वाङ्गुलाङ्गुलवर्धनात् ॥६६॥ विंशन्मात्रावधिर्यावत् पादविष्कम्भमिष्यते । अब भक्तिमान ( विभाजन, दूरी ) एवं स्तम्भ का आयाम संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है। प्रधान देवभवन के उपानत् ( अधिष्ठान का ऊपरी भाग ) से उत्तरपर्यन्त की दूरी को सात बराबर भागों में बाँट कर दो भाग से मसूरक ( अधिष्ठान ) की ऊँचाई एवं पाँच भाग से स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। स्तम्भ को सभी अङ्गों से युक्त निर्मित करना चाहिये या स्तम्भ के प्रमाण को नौ भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग से अधिष्ठान एवं शेष भाग से स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। ढ़ाई हाथ से प्रारम्भ कर छः-छः अङ्गुल बढ़ाते हुये छः हाथ तक स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। इस प्रकार स्तम्भों की ऊँचाई पन्द्रह प्रकार की हो सकती है। भीतरी भित्ति की मोटाई के अनुसार स्तम्भ की चौड़ाई होनी चाहिये। यह भक्तिमान एवं लम्बाई छोटे एवं बड़े सभी देवालयों के लिये समान है। अथवा छः अङ्गुल से प्रारम्भ करके एक-एक अङ्गुल बढ़ाते हुये बीस अङ्गुलपर्यन्त पादविष्कम्भ ( स्तम्भ की चौड़ाई ) रखना चाहिये। पादोच्चार्धमधिष्ठानं षडष्टांशोनमेव वा ॥६७॥

त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९३ पादोदयत्रिभागैकं चतुर्भागैकमेव वा। पादबन्धमधिष्ठानं चारुबन्धमथापि वा ॥६८॥ पादोनमप्यलङ्कारं प्रस्तरस्याप्यलङ्कृतम्। पूर्वोक्तेन प्रकारेण युक्त्या तत्रैव योजयेत् ॥६९॥ अधिष्ठान की ऊँचाई स्तम्भ की ऊँचाई का आधा, छः या आठ भाग कम या स्तम्भ की ऊँचाई का तीसरा अथवा चौथा भाग रखना चाहिये। यह अधिष्ठान पादबन्ध या चारुबन्ध शैली का होना चाहिये। इसका चतुर्थांश कम प्रस्तर होना चाहिये, जो अलङ्करणों से सुसज्जित हो। इस प्रकार पूर्ववर्णित रीति से उचित ढंग से निर्माणकार्य करना चाहिये॥६७-६९॥ खलूरिका मनुष्याणां वासेष्वेवमुदीरिताः। प्रथमावरणाद्यावत् त्रिप्राकारान्तमावृतिः ॥७०॥ (जिस प्रकार देवालय में मालिका) उसी प्रकार मनुष्यों के आवास में खलूरिका का निर्माण गृह के चारो ओर होना चाहिये, जो प्रथम आवरण (प्राकार) से लेकर तीसरे प्राकार तक होता है॥७०॥ यथेष्टदिशि हि द्वारं युक्त्या युक्तं नृणां मतम्। परिवारविमानानि तत्तदुक्तपदे क्रमात् ॥७१॥ आर्यात्पूर्वोक्तनीत्या तु प्रासादाभिमुखान्यपि। नृत्तमण्डपपीठादि परिवाराद् बहिः पुरः ॥७२॥ स्नानार्थं मण्डपं वाऽपि नृत्तमण्डपमेव वा। परिवारालयान्तैर्वा कर्तव्यं स्वप्रमाणतः ॥७३॥ उनके द्वारों को अभीप्सित दिशा में मनुष्यों के भवन में कहे गये नियम के अनुसार स्थापित करना चाहिये। (मालिकापङ्क्ति में) परिवार-देवालयों को जिन-जिन पदों में कहा गया है, उन्हें क्रमानुसार वहीं निर्मित करना चाहिये। आर्यक के पद से प्रारम्भ करते हुये पूर्ववर्णित नियम के अनुसार देवालय की ओर उन्मुख बनाना चाहिये। इन परिवार-देवालयों के बाहर नृत्य-मण्डप एवं पीठ (वेदी) आदि का निर्माण करना चाहिये अथवा स्नान-मण्डप एवं नृत्य-मण्डप परिवारदेवालय के भीतर भी प्रमाण के अनुसार निर्मित हो सकता है॥७१-७३॥ ✵ पीठलक्षणम् ✵ गर्भगृहार्धेन समौ पीठव्यासोच्छ्रयौ मतौ। एकद्वित्रिकरव्यासोत्सेधं वा बलिविष्टरम् ॥७४॥

२९४ मयमतम् गोपुरात्तु बहिः पीठं प्रासादार्धेन निर्गमम् । तत्समं वा त्रिपादं वा निर्गमं बलिविष्टरम् ॥७५॥ पञ्चानामपि सालानामारान् पैशाचमग्रतः । पैशाचपीठप्रासादमध्ये तु बलिविष्टरम् ॥७६॥ पीठ के लक्षण—गर्भगृह के व्यास के आधे प्रमाण से दो पीठों की चौड़ाई एवं ऊँचाई रखनी चाहिये। बलिविष्टर ( जहाँ बलि दी जाय ) की ऊँचाई एवं चौड़ाई एक, दो या तीन हाथ होनी चाहिये। ( पिशाच ) पीठ को गोपुर से बाहर प्रसाद की चौड़ाई के आधे भाग की दूरी पर निर्मित करना चाहिये। बलिविष्टर की गोपुर से दूरी उपर्युक्त माप के बराबर अथवा तीन चौथाई होनी चाहिये। पिशाचपीठ को पाँचों प्राकारों के बाहर एवं मन्दिर के सम्मुख होना चाहिये तथा बलिविष्टर को पिशाचपीठ एवं प्रासाद के मध्य में निर्मित करना चाहिये॥७४-७६॥ पीठोत्सेधे षोडशभागे भागेन जन्मं स्यात् । जगती चतुरंशेन कुर्यात् कुमुदं त्रि

त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९५ ☀ ध्वजस्थानम् ☀ वृषभस्याग्रतः कुर्यात् प्रसादार्धप्रमाणतः। ध्वजस्थानं तदग्रे तु तन्नीत्वा त्रिशिखालयम् ॥८२॥ एते वृषादयः सर्वे चान्तर्वमे तु गोपुरात्। प्रासाद के आधे माप से वृषभ के अग्र भाग में ध्वजस्थान का निर्माण होना चाहिये एवं आगे त्रिशिखालय (त्रिशूल) होना चाहिये। ये सभी वृष आदि गोपुर के वाम भाग में (प्राकार के) भीतर होने चाहिये॥८२॥ ☀ प्राकाराश्रितस्थानानि ☀ मर्यादिसालमाश्रित्य पावके हव्यकोष्ठकम् ॥८३॥ अग्निगोपुरयोर्मध्ये धनधान्यगृहं भवेत्। याम्ये मज्जनशाला स्यात्तत्रस्थं पुष्पमण्डपम् ॥८४॥ प्राकार के आश्रित स्थान—मर्यादि साल (प्राकार) से सटा कर आग्नेय कोण में हवि का प्रकोष्ठ होना चाहिये। अग्निकोण एवं गोपुर के मध्य में धन-धान्य का गृह होना चाहिये। यम के प्रकोष्ठ पर मज्जनशाला (स्नानमण्डप) एवं वहीं पुष्पमण्डप निर्मित होना चाहिये॥८३-८४॥ नैर्ऋतिस्थानमाश्रित्य कुर्यादायुधमण्डपम्। वरुणे वायुदेशे तु शयनस्थानमिष्यते ॥८५॥ निर्ऋति के स्थान पर अस्त्र-मण्डप एवं वरुण तथा वायु के स्थान पर शयनस्थान निर्मित करना चाहिये॥८५॥ सौम्यायां तु प्रकर्त्तव्यं धर्मश्रवणमण्डपम्। ईशे वापी च कूपं स्यादापवत्सपदाश्रितम् ॥८६॥ ईशगोपुरयोर्मध्ये वाद्यस्थानं प्रकीर्तितम्। आरादीशे विमानस्य स्थानं चण्डेश्वरस्य वा ॥८७॥ पूर्वोक्तस्थानदेशे वा कर्तव्यं भवनं बुधैः। सोम के पद पर धर्मश्रवण-मण्डप (जहाँ धर्मसभा, धर्मविषयक प्रवचन होते हों) होना चाहिये। ईश के पद पर एवं आपवत्स के पद पर वापी एवं कूप होना चाहिये। ईश एवं गोपुर के मध्य स्थल में वाद्यस्थान होना चाहिये। विमान के निकट ही ईश के पद पर चण्डेश्वर का स्थान होना चाहिये। अथवा पूर्ववर्णित स्थान पर बुद्धिमान को निर्माण करना चाहिये॥८६-८७॥

२९६ मयमतम् ❋ शक्तिस्तम्भः ❋ शक्तिस्तम्भं पीठात्पुरतो विद्याद्विमानमानेन ।।८८।। क्षुद्राणां द्विगुणोदयमल्पयानां तत्समं विद्यात्। मध्यविमानानामपि तुङ्गार्धं वा त्रिपादोच्चम् ।।८९।। उदयत्रिभागमुदितं वाऽर्धं वोत्कृष्टहर्म्याणाम्। हस्तं षोडशमात्रं द्वादशदशमात्रकं विपुलम् ।।९०।। मण्डीकुम्भयुतं तत्फलकोऽर्ध्वे भूतमुक्षा वा। शैलं दारुमयं वा वृत्तं वाष्टास्रकं द्विरष्टास्रम् ।।९१।। (विमान के) पीठ के सामने विमान के मान के अनुसार शक्तिस्तम्भ होना चाहिये। क्षुद्र (अत्यन्त छोटे) मन्दिर की ऊँचाई के दुगुने माप की शक्तिस्तम्भ की ऊँचाई होनी चाहिये। अल्प (छोटे) विमान का शक्तिस्तम्भ उसके बराबर माप का तथा मध्यम विमान में उसकी ऊँचाई का आधा या तीन चौथाई माप का शक्तिस्तम्भ होना चाहिये। उत्तम विमान में उसकी ऊँचाई के तीसरे या आधे भाग के बराबर शक्तिस्तम्भ की ऊँचाई होनी चाहिये। इसकी चौड़ाई एक हाथ, सोलह अङ्गुल या दश अङ्गुल होनी चाहिये। शक्तिस्तम्भ को मण्डि एवं कुम्भ से युक्त होना चाहिये एवं उसके ऊपर भूत या वृषभ की आकृति होनी चाहिये। यह भाग प्रस्तर या काष्ठ से निर्मित होना चाहिये तथा इसे वृत्ताकार, अष्टकोण या सोलह कोण का होना चाहिये। ❋ इतरस्थानानि ❋ वेशस्थानं वापी कूपारामौ च दीर्घिका चैव। सर्वत्र सम्मतं स्यान्मठभुक्तिनिकेतनं चापि ।।९२।। अन्य स्थान—वेशस्थान (पुरोहित का आवास), वापी (बावड़ी), कूप, बगीचा एवं दीर्घिका (तालाब) सभी स्थानों में (कहीं भी) हो सकते हैं। इसी प्रकार मठ एवं भोजनशाला भी कहीं भी निर्मित हो सकते हैं।।९२।। नान्तर्मण्डलमथ वा चान्तर्हारं तथैकसालं चेत्। अन्तर्हारा मध्यमहारा मर्यादाभित्तिश्च ।।९३।। त्रिप्राकारेऽप्युदिताः पञ्चयुताः पञ्चसालाः स्युः। एषां प्रकाराणामुपरि वृषाः स्युः सपङ्क्तिकाः परितः ।।९४।। यदि विमान में एक प्राकार हो तो वह अन्तर्मण्डल न होकर अन्तर्हार होता है। यदि तीन प्राकार हों तो वे अन्तर्हार, मध्यमहार एवं मर्यादाभित्ति होते हैं। यदि पाँच प्राकार हों (तो वे पूर्ववर्णित होते हैं)। इन प्राकारों के ऊपर चारो ओर पङ्क्ति में वृषभों की आकृतियाँ निर्मित होती हैं।।९३-९४।।