मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७७ तदधः सार्धसप्तांशैः सत्रिपादगुणांशकैः । स्तम्भं च तलकं कुर्यात्तारेऽंशं तत्र पूर्ववत् ॥६२॥ एवं नवतलं प्रोक्तं दशभौममथोच्यते । उसके ऊपरी तल ( नौ तल ) में निचले तल से ऊपर साढ़े सात भाग से स्तम्भ एवं पौने चार भाग से तल ( अधिष्ठान ) बनाना चाहिये। तल का विस्तार पूर्ववत् होना चाहिये। इस प्रकार नौ तल का मन्दिर निर्मित होता है। अब दशवें तल का वर्णन किया जा रहा है॥६२॥ तदधोऽष्टयुगांशैस्तु पादं मसूरकं भवेत् ॥६३॥ तारे पूर्वोक्तभागैस्तु मनुभागैरथापि वा। (दसवें तल के लिये ) निचले तल के ऊपर आठ भाग से पाद ( स्तम्भ, तल की ऊँचाई ) एवं चार भाग से मसूरक होता है। चौड़ाई पूर्वोक्त रीति से या चौदह भाग में बाँटनी चाहिये॥६३॥ तदधः सार्धवस्वंशैः सपादयुगभागिकैः ॥६४॥ स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे तद्वच्च पक्षकैः । तथा द्विरष्टभागैस्तु सप्तदशांशकैस्तु वा ॥६५॥ एकादशतलं प्रोक्तं द्वादशं क्षममुच्यते । इसके ऊपरी तल ( ग्यारह तल ) में निचले तल के ऊपर साढ़े आठ भाग से स्तम्भ एवं सवा चार से मसूरक निर्मित करना चाहिये। चौड़ाई पूर्ववर्णित अथवा पन्द्रह, सोलह या सत्रह भागों में बाँटनी चाहिये। इस प्रकार ग्यारह तल का देवालय निर्मित होता है। अब बारह तल के देवालय का वर्णन किया जा रहा है॥६४-६५॥ ❋ द्वादशतलविधानम् ❋ तदधो नन्दनन्दार्धभागैः स्तम्भं मसूरकम् ॥६६॥ तारे द्विरष्टभागादि यावदर्कद्वयांशकम् । गृहपिण्ड्यलिन्द्रहारा गर्भागाराद्वहिः क्रमात् ॥६७॥ हर्म्यस्यावधिकं यावन्नीयते तावदंशकैः । द्वित्रिवेदैषु षड्भागैः प्रागुक्तांशैस्तु वा गृहम् ॥६८॥ बारह तल के देवालय का विधान—( बारह तल के देवालय के लिये ) निचले तल ( की भूमि ) के नौ भाग करने चाहिये। साढ़े चार भाग से मसूरक होने चाहिये। चौड़ाई को सोलह से चौबीस भागों में बाँटना चाहिये। गर्भगृह से लेकर भवन