भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२७६ मयमतम् प्रस्तरं तलिपमञ्चवेदिकं कन्धरं शिखरकुम्भकं क्रमात्। पञ्चभौममुदितं विशालके नन्दपङ्क्तिभिरथेन्द्रियांशकैः ॥५७॥ पाँच तल के देवालय का विधान—पाँच तल के देवालय की ऊँचाई को अड़तालीस बराबर भागों में बाँटना चाहिये। पौने तीन भाग से कुट्टिम, साढ़े पाँच भाग से चरण (स्तम्भ, प्रथम तल की ऊँचाई), ढाई भाग से मञ्च, सवा पाँच भाग से पादक (स्तम्भ, द्वितीय तल की ऊँचाई), ढाई भाग से प्रस्तर, पाँच भाग से तलिप (तृतीय तल की ऊँचाई), सवा दो भाग से मञ्च, पौने पाँच भाग से अङ्घ्रि (स्तम्भ, चतुर्थ तल की ऊँचाई), दो भाग से प्रस्तर, सवा चार भाग से तलिप (स्तम्भ, पाँचवें तल की ऊँचाई) पौने दो भाग से मञ्च, एक भाग से वेदिका, दो भाग से कन्धर, सवा चार भाग से शिखर एवं दो भाग से कुम्भ की रचना करनी चाहिये। पाँच तल के देवालय की चौड़ाई को नौ, दश या ग्यारह बराबर भागों में बाँटना चाहिये। ✵ षडाद्यैकादशभूम्यन्तविधानम् ✵ उच्छ्रये तदधः षड्भिर्गुणांशैरङ्घ्रिकं तलम्। षड्भौममेवमुद्दिष्टं ताराभागं तथा भवेत् ॥५८॥ (पूर्ववर्णित पाँच तल से ऊपर तल में) निचले तल से ऊपर ऊँचाई में छः भाग से अङ्घ्रि (स्तम्भ, तल की ऊँचाई) एवं तीन भाग से तल (अधिष्ठान) निर्मित करना चाहिये। इसकी चौड़ाई पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होनी चाहिये॥५८॥ तदधः सार्धषड्भागैः सपादगुणभागकैः। स्तम्भं मसूरकं कुर्यात्तारे रुद्रार्कभागतः ॥५९॥ सप्तभौममिदं प्रोक्तं विमानं सार्वदेशिकम्। (सातवें तल के लिये) निचले तल के ऊपर ऊँचाई में साढ़े छः भाग से स्तम्भ एवं मसूरक सवा तीन भाग से निर्मित करना चाहिये तथा विस्तार को ग्यारह या बारह भाग से रखना चाहिये। सात तल वाला यह विमान प्रत्येक स्थान एवं अवसर के लिये उपयुक्त होता है॥५९॥ तदधो मुनिभिः सार्धगुणांशैः स्तम्भकुट्टिमम् ॥६०॥ धर्मरुद्रार्कभागैस्तु सप्रयोदशभागिकैः। अष्टभौमं वदन्त्यस्मिन्नेवं प्राज्ञा मुनीश्वराः ॥६१॥ उसके ऊपरी तल में सात भाग से स्तम्भ एवं साढ़े तीन भाग से कुट्टिम रखना चाहिये। इसकी चौड़ाई को दश, ग्यारह, बारह या तेरह भाग में बाँटना चाहिये। आठ तल के मन्दिर के निर्माण के विषय में मुनियों का विचार इस प्रकार वर्णित है।