भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७५ शाला की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है। उसके ऊपर (के तल के) छः भाग होते हैं। सौष्ठी की चौड़ाई एक भाग से एवं उसकी लम्बाई उसके दुगुनी होती है। कोष्ठ एवं नीड की चौड़ाई आधे भाग से होनी चाहिये। उसके ऊपर के (तल के) चार भाग होने चाहिये एवं दो भाग से मध्य-भद्र की रचना करनी चाहिये।।५१।। दण्डेन निर्गममुपर्यपि भद्रनीडं सार्धं द्विदण्डविपुलं गलनासिकं च। वृत्ताभकन्धरवितर्दिकमस्तकं स्या- दष्टार्धनासिकमदभ्रमथाल्पमष्टौ ।।५२।। दण्ड-प्रमाण से निर्गम होना चाहिये। इसके ऊपर भद्रनीड निर्मित होना चाहिये। गल एवं नासिक ढाई दण्ड चौड़ा होना चाहिये। कन्धर, वितर्दिक एवं मस्तक गोलाई लिये होना चाहिये। आठ अर्धनासिक एवं आठ अल्पनासिक होना चाहिये।।५२।। कूटं च नीडमथ कोष्ठकमुन्नतंस्था- दा