भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२७४ मयमतम् यदि भवन के अलङ्करण भिन्न हों एवं शालाओं के मध्य में भद्रक हों, ग्रीवा एवं शिरोभाग गोलाई लिये हों तो इस देवालय का नाम 'मनोहर' होता है।।४६।। ❋ आवन्तिकम् ❋ तदेवान्यदलङ्कारं वेदास्त्रं कन्धरं शिरः ॥४७॥ नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलङ्कृतम् । नाम्नावन्तिकमित्युक्तं शम्भोर्मन्दिरमुत्तमम् ॥४८॥ यदि अलङ्करण भिन्न हों, कन्धर एवं शिरो-भाग चौकोर हों, विभिन्न प्रकार के मसूरक, स्तम्भ एवं वेदिका आदि से अलङ्कृत हों तो इस देवालय की संज्ञा 'आवन्तिक' होती है। यह भवन शिव-मन्दिर के लिये उपयुक्त होता है।।४७-४८।। ❋ सुखावहम् ❋ त्रिःसप्तहस्तविपुले चतुरंशनाली धर्मांशकेंऽशमभितो गृहपिण्डमानम्। अन्थारमंशमभितोंऽशकमङ्गहारं कूटं च नीडमथ कोष्ठकमंशतारम् ॥४९॥ शालायतं द्विगुणमंशकतारहारं वातायनैर्मकरतोरणकैर्विचित्रम् । त्यक्त्वा जलस्थलमुपर्यपि चाष्टभागे कूटं च नीडमथ कोष्ठकमंशतत्या ॥५०॥ यदि विस्तार इक्कीस हाथ हो तो उसके दश भाग करने चाहिये। चार भाग से नाली ( गर्भगृह ), एक भाग से चारो ओर भीतरी भित्ति की मोटाई, एक भाग से अन्धार, उसके चारो ओर एक भाग से हारामार्ग का विस्तार तथा एक भाग से कूट, नीड एवं कोष्ठक का विस्तार रखना चाहिये। शाला की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। हारा-मार्ग की चौड़ाई एक भाग से रखनी चाहिये। वातायन ( खिड़की, झरोखा ) एवं मकर-तोरण से सज्जा करनी चाहिये। इसके ऊपरी भाग में जल-भाग को छोड़ कर आठ भाग करना चाहिये। कूट, नीड एवं कोष्ठक का विस्तार एक भाग से रखना चाहिये।।४९-५०।। शालायतं द्विगुणमूर्ध्वतले षडंशे सौष्ठ्यंशमंशविपुलं द्विगुणायतं स्यात् । कोष्ठं च नीडविपुलं हि तदर्थभागं चोर्ध्वं युगांशनयनांशकमध्यभद्रम् ॥५१॥