मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७३ युक्त हो। पादुक से उत्तर के मध्य नौ भाग से उपपीठ, दो भाग ऊँचा मसूरक, उसका दुगुना ऊँचा स्तम्भ, आधे भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, आधे भाग से वेदिका तथा उत्तर से प्रारम्भ कर कपोत तक गल का निर्माण करना चाहिये।।३७-४०।। पञ्जराकृतिसंयुक्तं कपोतात्तु विनिर्गतम् । यथाशोभं यथायुक्ति तथा शक्तिध्वजान्वितम् ।।४१।। 'कपोतपञ्जरं ह्येतत् प्रासादे सार्वदेशिके । हारायां वाऽथ शालायां मध्ये मध्ये तु योजयेत् ।।४२।। पञ्जर की आकृति से युक्त एवं कपोत से विनिर्गत (कपोतपञ्जर) होता है। जिस प्रकार अच्छा लगे एवं ठीक हो, उस प्रकार शक्ति-ध्वज से युक्त होना चाहिये। यह कपोतपञ्जर सभी प्रकार के देवालय के अनुकूल होता है। इसे हारा के या शाला के मध्य में निर्मित करना चाहिये।।४१-४२।। ✵ पुनः भद्रकूटम् ✵ कूटकोष्ठकनीडं चैवान्तरप्रस्तरान्वितम् । जलस्थलं विहायोर्ध्वभूमावष्टांशसौष्ठिकम् ।।४३।। द्विगुणं कोष्ठकायामं तयोर्मध्ये तु पञ्जरम् । तदूर्ध्वे रसभागे तु सौष्ठिकोष्ठं तु पूर्ववत् ।।४४।। विजयस्य यथा प्रोक्तं शेषमूर्ध्वं तु योजयेत् । कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् संख्यया विदुः ।।४५।। महानीडं द्विरष्टौ स्यान्नाम्नेदं भद्रकूटकम् । कूट, कोष्ठक एवं नीड अन्तर-प्रस्तर से युक्त होते हैं। इसके ऊपर जल-स्थल को छोड़ कर आठ भाग बचते हैं। एक भाग से सौष्ठिक का निर्माण होना चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई (चौड़ाई की) दुगुनी होनी चाहिये। उनके मध्य में पञ्जर होना चाहिये। उसके ऊपर छः भाग करना चाहिये। सौष्ठिक एवं कोष्ठ पहले की भाँति होने चाहिये। इसके ऊपरी भाग में जो योजना 'विजय' के लिये कही गयी है, वही यहाँ भी होनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अङ्गों की संख्या पूर्व-वर्णित होनी चाहिये। महानीड की संख्या सोलह होनी चाहिये। इस देवालय की संज्ञा 'भद्रकूट' होती है।।४३-४५।। ✵ मनोहरम् ✵ तदेवान्यदलङ्कारं शालामध्ये सभद्रकम् ।।४६।। वृत्तग्रीवाशिरोयुक्तमेतन्नाम्ना मनोहरम् । मयं०-१८