भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२७२ मयमतम् आठ कोण का होना चाहिये। बारह कोष्ठक, बारह सौष्ठिक एवं आठ पञ्जर होना चाहिये। आठ लम्बपञ्जर एवं सोलह क्षुद्रनीड होना चाहिये। गल पर आठ नासी हों एवं कोष्ठक कुछ ऊँचे हों। विभिन्न प्रकार के मसूरक, स्तम्भ, वेदी, जालक (झरोखा, रोशनदान) एवं तोरण हों। नाना प्रकार के अलङ्करणों एवं विभिन्न प्रकार के अङ्कनों से युक्त हो। अधिष्ठान उपपीठ से युक्त हो या केवल मसूरक हो। स्वस्तिक की आकृति निर्मित हो एवं नासिकाओं से सुसज्जित हो। ऊँचे भाग की संरचना पूर्व-वर्णित विधि से हो। इस देवालय को 'जयावह' संज्ञा दी गई है।।३०-३३।। ✺ भद्रकूटम् ✺ नवपङ्क्तिकरव्यासे दशभागविभाजिते ॥३४॥ गर्भगेहं चतुर्भागं गृहपिण्डस्तदंशके । अन्धारमंशमंशेन परितः खण्डहर्म्यकम् ॥३५॥ कूटकोष्ठकनीडानां तारमंशेन योजयेत् । कोष्ठकं द्विगुणायामं हारा भागसमन्विता ॥३६॥ उन्नीस हाथ की चौड़ाई को दश भागों में बाँटा जाता है। चार भाग से गर्भगृह, एक भाग से भित्ति की मोटाई, एक भाग से अन्धार, एक भाग से चारो ओर खण्ड- हर्म्यक, एक-एक भाग से कूट, कोष्ठक एवं नीड की चौड़ाई रखनी चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये तथा एक भाग से हारा-मार्ग की रचना होनी चाहिये।।३४-३६।। ✺ कपोतपञ्जरम् ✺ पञ्चांशे सौष्ठिकव्यासे मध्ये द्व्यंशेन विस्तरम् । एकभागविनिष्क्रान्तयुग्मस्तम्भसमन्वितम् ॥३७॥ सोपपीठमधिष्ठानं समञ्चं सवितर्दिकम् । सकन्धरशिरोयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम् ॥३८॥ पादुकोत्तरयोर्मध्ये नवांशेनोपपीठकम् । मसूरकं द्विभागोच्चं द्विगुणं स्तम्भदैर्घ्यकम् ॥३९॥ सार्धांशं प्रस्तरोत्सेधमर्धांशं वेदिकोदयम् । उत्तरादिकपोतान्तं गलोदयमितीरितम् ॥४०॥ सौष्ठिक का व्यास मध्य में पाँच में से दो भाग से निर्मित होना चाहिये। एक भाग से विनिष्क्रान्त का निर्माण होना चाहिये, जो दो स्तम्भों से युक्त हो। यह उपपीठ, अधिष्ठान, मञ्च, वितर्दिक, कन्धर एवं शिरोभाग से युक्त हो तथा सभी अलङ्करणों से