भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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द्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७१ कूटं कोष्ठं च नीडं च भागेन परिकल्पयेत् । कोष्ठायामं द्विभागं स्याच्छेषं हारा सपञ्जरम् ॥२६॥ कूट, कोष्ठ एवं नीड की रचना एक-एक भाग से करनी चाहिये। कोष्ठ की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी हो एवं शेष भाग से पञ्जरयुक्त हारा का निर्माण करना चाहिये।।२६।। जलस्थलं विहायोर्ध्वं वसुभागैर्विभाजिते । भागेन कूटविस्तारं कोष्ठकं द्विगुणायतम् ॥२७॥ हारान्तरे तथांशेन लम्बपञ्जरमीरितम् । तदूर्ध्वे रसभागे तु भागं सौष्ठिकविस्तृतम् ॥२८॥ इसके ऊपर ( दूसरे तल ) जलस्थान को छोड़ कर आठ भाग करना चाहिये। एक भाग से कूट की चौड़ाई रखनी चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। हारा के मध्य में एक भाग से लम्ब पञ्जर ( लटकती हुई सजावटी आकृति ) होनी चाहिये। इसके ऊपर ( तीसरे तल पर ) छः भाग करने चाहिये। एक भाग से सौष्ठिक का विस्तार करना चाहिये।।२७-२८।। द्विभागं कोष्ठकायामं हारायां क्षुद्रपञ्जरम् । तदूर्ध्वे तु त्रिभागेन मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥२९॥ कोष्ठक की लम्बाई ( चौड़ाई की ) दुगुनी होनी चाहिये। हारामार्ग में क्षुद्र-पञ्जर होना चाहिये। उसके ऊपर ( चतुर्थ तल पर ) के तीन भाग होने चाहिये। मध्य भाग में एक दण्ड का निर्गम निर्मित होना चाहिये।।२९।। चतुरस्रमधिष्ठानमष्टास्रं गलमस्तकम् । त्रिचतुष्कोष्ठकं तावत् सौष्ठिकं चाष्टपञ्जरम् ॥३०॥ लम्बपञ्जरमष्टौ हि क्षुद्रनीडं द्विरष्टकम् । गलनास्यष्टसंयुक्तं कोष्ठकं किञ्चिदुन्नतम् ॥३१॥ नानामसूरकस्तम्भवेदीजालकतोरणम् । नानालङ्कारसंयुक्तं नानाचित्रैर्विचित्रितम् ॥३२॥ सोपपीठमधिष्ठानं केवलं वा मसूरकम् । स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभिरलङ्कृतम् ॥३३॥ पूर्ववत् तुङ्गभागं स्यादेतन्नाम्ना जयावहम् । इस भवन ( देवालय ) का अधिष्ठान चौकोर होना चाहिये एवं गल तथा मस्तक