मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० मयमतम् तदुपर्यष्टभागेन विभजेत् कूटमंशकम् । कोष्ठकस्य तु विस्तारं तदेव द्विगुणायतम् ॥१९॥ कूटशालान्तरे नीडमंशेन परिकल्पयेत् । तदूर्ध्वे रसभागे तु कूटमंशेन कोष्ठकम् ॥२०॥ ऊपरी ( दूसरे ) तल की चौड़ाई को आठ भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग से कूट एवं एक भाग से कोष्ठक रखना चाहिये। कोष्ठक की लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। कूट एवं शाला के मध्य में एक भाग से नीड की रचना करनी चाहिये। उसके ऊपर ( तृतीय तल ) के छः भाग करने चाहिये एवं कूट तथा कोष्ठक का निर्माण एक भाग से करना चाहिये ॥१९-२०॥ विस्तारद्विगुणायाममन्तरेऽर्धेन पञ्जरम् । ऊर्ध्वभूमे चतुर्भागे मध्ये दण्डेन निर्गमम् ॥२१॥ अष्टास्रं कर्णकूटं स्यात् कोष्ठकं क्रकरीकृतम् । महाशिखरमष्टास्रमष्टनास्या विभूषितम् ॥२२॥ कूटकोष्ठकनीडानां संख्यायां पूर्ववत् ततिः । अस्याप्युत्सेधभागं च पूर्ववत् परिकल्पयेत् ॥२३॥ भद्रकोष्ठमिदं नाम्ना वेदभौमं दिवौकसाम् । ( कूट एवं कोष्ठक की ) लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होनी चाहिये। इनके मध्य में आधे भाग से पञ्जर होना चाहिये। इसके ऊपरी भाग के चार भाग होने चाहिये। मध्य भाग में एक दण्ड का निर्गम होना चाहिये। कर्णकूट अष्टकोण हों एवं कोष्ठक क्रकरी ( दिशाओं में कोण ) हों। महाशिखर अष्टकोण हो तथा आठ नासियों से अलङ्कृत हो। कूट, कोष्ठक एवं नीड की संख्या, विस्तार एवं ऊँचाई आदि के माप पूर्वोक्त रीति से होने चाहिये। चार तल वाला यह देवालय 'भद्रकोष्ठ' संज्ञक होता है ॥२१-२३॥ ✺ जयावहम् ✺ सप्तदशकरव्यासं दशभागैर्विभाजयेत् ॥२४॥ नालीगृहं चतुर्भागमंशेनान्धारिका भवेत् । अलिन्द्रमंशमंशेन परितः खण्डहर्म्यकम् ॥२५॥ सत्रह हाथ के व्यास को दश भागों में बाँटना चाहिये। चार भाग से नालीगृह ( गर्भगृह ), एक भाग से अन्धारिका ( भीतरी भित्ति ), एक भाग से अलिन्द एवं एक भाग से चारो ओर खण्ड-हर्म्यक का निर्माण करना चाहिये ॥२४-२५॥