मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २६९ सभी अलङ्करणों से युक्त इस भवन ( देवालय ) की संज्ञा 'सुभद्रक' होती है। ✸ श्रीविशालम् ✸ सर्वं प्राग्वत्कूटकोष्ठादियुक्त्या मध्ये मध्ये मस्तकं मण्डलाभम् । वृत्ताकारं स्यात् सभानां शिरस्तद्विस्तारार्धेनान्वितं गर्भगेहम् ॥१३॥ शेषं त्र्यंशेनावृतावासपिण्डस्तत्तुल्यं तद्बाह्यतोऽन्धारहारम् । नानाधिष्ठानाङ्घ्रिवेदीप्रयोगं नाम्नेदं स्याच्छ्रीविशालं सुहृद्यम् ॥१४॥ जिस देवालय के ( कोणों पर तथा मध्य में ) कूट एवं कोष्ठ आदि हों तथा बीच- बीच में भवन की छत गोलाई लिये हो, कोणकोष्ठ भी मण्डलाकार हों, गर्भगृह भवन के विस्तार के आधे पर ( मध्य ) स्थित हो, भीतर की भित्ति की मोटाई शेष का तृतीयांश हो तथा यही माप बाहर की भित्ति ( अन्धार हार ) का होना चाहिये। इस भवन के अनुरूप विविध प्रकार के