मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ मयमतम् तदूर्ध्वं गुणाभागेंडशं मध्ये दण्डेन निर्गमम् । उत्सेधं विभजेद् विद्वान् नवत्रिंशतिसंख्यया ॥६॥ उसके ऊपर ( के तल ) के तीन भाग करना चाहिये। मध्य का भाग एक अंश ( आधा ) रखना चाहिये एवं निर्गम का माप एक दण्ड रखना चाहिये। बुद्धिमान स्थपति को ऊँचाई के उन्तालीस भाग करने चाहिये।।६।। सार्धद्व्यंशमधिष्ठानं पञ्चांशं पाददैर्घ्यकम् । तदर्धं प्रस्तरोत्सेधं सत्रिपादयुगांशकम् ॥७॥ ऊर्ध्वभूम्यङ्घ्रिकोत्सेधं सपादद्व्यंशमञ्चकम् । जङ्घा तद्द्विगुणा चोर्ध्वं द्व्यंशेन प्रस्तरोदयम् ॥८॥ पादाधिकचतुर्भागमुपरिस्तम्भतुङ्गकम् । स्यात् सत्रिभागपादेन प्रस्तरं वेदिकांशकम् ॥९॥ गलोच्चमश्विनीभागं सार्धवेदैस्तु मूर्धनि । शेषभागं शिखामानमाहोमं चतुरस्रकम् ॥१०॥ ( प्रथम तल में ) ढाई भाग से अधिष्ठान, पाँच भाग से स्तम्भ की लम्बाई ( प्रथम तल के भवन की ऊँचाई ), ( द्वितीय तल में ) इसके आधे माप की प्रस्तर की ऊँचाई एवं पौने पाँच भाग से ( तल की ) स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। ( तीसरे तल में ) सवा दो भाग से मञ्चक और उसके दुगुने प्रमाण से जङ्घा होनी चाहिये। इसके ऊपर ( चौथे तल में ) दो भाग से प्रस्तर एवं सवा चार भाग से स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। इसके ऊपर सवा एक भाग से प्रस्तर, एक भाग से वेदिका, गल की ऊँचाई दो भाग से, शिखर सवा चार भाग से तथा शेष भाग से शिखा का प्रमाण रखना चाहिये। पूरा भवन भूतल से चौकोर होता है।।७-१०।। रविसंख्या भवेत् सौष्ठी कोष्ठं तावत्तु पञ्जरम् । शिखरे वेदनास्यः स्युश्चाल्पनास्या विभूषितम् ॥११॥ स्वस्तिकाकारसंयुक्तं नासिकाभिरलङ्कृतम् । प्राग्वदेव तलं चाधः स्तम्भालङ्कारतोरणम् ॥१२॥ सर्वालङ्कारसंयुक्तमेतद्धर्म्यं सुभद्रकम् । इस भवन में बारह सौष्ठी, बारह कोष्ठ एवं पञ्जर शिखर पर चार नासी होनी चाहिये एवं अल्पनासियों से अलङ्कृत होनी चाहिये। इसे स्वस्तिक की आकृति से एवं नासिका से अलङ्कृत होना चाहिये। तल के नीचे ( अधिष्ठान ) पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होना चाहिये तथा स्तम्भ, अलङ्करण एवं तोरण निर्मित होना चाहिये।