भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अथ द्वाविंशोऽध्यायः ( चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् ) पञ्चमानं चतुर्भौमं वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् । त्रिचतुष्षङ्क्तिहस्तादिद्विहस्तविवर्धनात् ॥१॥ एकद्वाविंशदन्तं तु व्यासं तुङ्गं तु पूर्ववत् । चार तल से लेकर बहुतलों के देवालयों का विधान—चार तल वाले भवन ( देवालय ) के पाँच प्रकार के प्रमाणों का संक्षेप में क्रमानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इसका व्यास तेरह या चौदह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये इक्कीस या बाईस हाथ तक जाता है एवं भवन की ऊँचाई पूर्वोक्त नियम के अनुसार रक्खी जाती है॥१॥ ❋ सुभद्रकम् ❋ विस्तारोत्सेधमानाभ्यां भागान् वक्ष्यामि हर्म्यके ॥२॥ त्रयोदशकरव्यासमष्टधा विभजेत् समम् । एकांशं कूटविस्तारं शालायामं द्विभागिकम् ॥३॥ भागेन पञ्जरव्यास मूर्ध्वं तु पुनरष्टधा । प्राग्वदेव सभाशालापञ्जराणामुपर्यपि ॥४॥ विस्तार एवं ऊँचाई के प्रमाण से भवन के भागों की चर्चा कर रहा हूँ। तेरह हस्त के व्यास को बराबर-बराबर आठ भागों में बाँटना चाहिये। एक भाग से कूट का विस्तार, दो भाग से शाला का विस्तार एवं एक भाग से पञ्जर का विस्तार करना चाहिये। उसके ऊपर ( दूसरे तल ) को भी आठ भागों में बाँटना चाहिये। सभाकक्ष, शाला एवं पञ्जर के ऊपर पूर्ववर्णित ( कूटादि ) का निर्माण करना चाहिये॥२-४॥ ऊर्ध्वं षड्भागिके भागमेकं कूटस्य विस्तृतम् । द्विभागं कोष्ठकायामं नीडं भागार्धमिष्यते ॥५॥ ऊपरी भाग ( तीसरी मञ्जिल ) के छः भाग करने चाहिये। एक भाग से कूट का विस्तार, दो भाग से कोष्ठक की लम्बाई एवं आधे भाग से नीड का माप करना चाहिये॥५॥