मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ मयमतम् की सीमा तक क्रमशः गृहपिण्ड ( भित्ति ), अलिन्द्र एवं हारामार्ग को उनके भाग के अनुसार रखना चाहिये। गर्भगृह दो, तीन, चार या छः भाग से या पूर्वोक्त भाग से निर्मित करना चाहिये।।६६-६८।। एकार्धेनाथवालिन्द्रं शेषं कुड्येषु योजयेत्। केचित् त्रिनवभिर्भागैर्वदन्ति द्वादशावनौ ।।६९।। षट्कुड्यं पञ्चसालिन्द्रं बहिः कूटादिशोभितम्। कूटं कोष्ठं च नीडं च क्षुद्रशालेभतुण्डकम् ।।७०।। अलिन्द्र की संरचना एक या डेढ़ भाग से करनी चाहिये एवं शेष भाग से भित्ति निर्मित होनी चाहिये। कुछ विद्वानों के अनुसार बारहवें तल के सत्ताईस भाग करने चाहिये। छः भाग से भित्ति एवं पाँच भाग से अलिन्द्र निर्मित होना चाहिये। बाहरी भाग में कूटादि से अलङ्करण होना चाहिये। वहाँ कूट, कोष्ठ, नीड, क्षुद्र-शाल एवं गज- शुण्ड निर्मित होना चाहिये।।६९-७०।। यथाशोभमलङ्कारं तथा युञ्जीत बुद्धिमान्। युग्महस्तैरयुग्मैर्वा योजयेदेवमिच्छया ।।७१।। इन अलङ्करणों को इस प्रकार निर्मित करना चाहिये, जिससे वे सुन्दर लगें। इन्हें सम-हस्तप्रमाण से या विषम-हस्तप्रमाण से निर्मित करना चाहिये।।७१।। युग्मांशे द्व्यंशकं वाऽपि कूटव्यासं द्विरायतम्। शालायाश्चतुरंशैर्वा युग्मे युग्मांशकैर्विदुः ।।७२।। नानाभागैरलङ्कारैरन्यैरुक्तं मुनीश्वरैः। तथा वा तत्र युञ्जीयात्प्राज्ञः शिल्पिषु बुद्धिमान् ।।७३।। यदि प्रमाण सम संख्या में हों तो कूट का व्यास दो भाग से एवं चौड़ाई उसके दुगुनी रखनी चाहिये। अथवा शाला (कूट) की चौड़ाई चार भाग से रखनी चाहिये। सम संख्या का माप होने पर सभी भागों का माप सम संख्या में होना चाहिये। श्रेष्ठ मुनियों ने विभिन्न भागों एवं अलङ्करणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान शिल्पी को उन स्थानों पर उसी विधि से निर्माण करना चाहिये।।७२-७३।। ✺ खण्डहर्म्यम् ✺ तलमेकं भवेद् ग्रासं खण्डहर्म्यं चतुःस्थले। द्वितलं पञ्चषट्सप्तभूमावेव विधीयते ।।७४।। त्रितलं चाष्टभूमे तु नन्दपङ्क्तितले तथा। पञ्चभौमं चतुर्भौमं द्वादशैकादशे तले ।।७५।।