भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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द्वांविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २७९ खण्डहर्म्य में यदि देवालय चार तल का हो तो प्रथम तल की ऊँचाई पर ग्रास ( निर्माण का एक विशिष्ट अङ्ग ) होना चाहिये। यदि भवन पाँच, छः या सात तल का हो तो दूसरे तल की ऊँचाई पर; यदि भवन आठ, नौ या दश तल का हो तो तीसरे तल पर; यदि ग्यारह तल का भवन हो तो ग्रास चौथे तल पर तथा बारह तल वाले भवन में पाँचवें तल पर निर्मित होना चाहिये।।७४-७५।। ✱ कूटकोष्ठादि ✱ मूलतः कूटकोष्ठादीन् यः कर्तुं सम्यगीहते। तले तले विभागांश्च यथायुक्त्या प्रयोजयेत् ॥७६॥ कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गमपर्युपरि पूर्ववत्। कूटकोष्ठकनीडाद्यैर्भेदैराख्या यथोदिता ॥७७॥ जो व्यक्ति प्रथम तल से कूट-कोष्ठ आदि का उचित रीति से निर्माण करना चाहता है, उसे प्रत्येक तल का विभाग नियमानुसार करना चाहिये। प्रत्येक ऊपरी तल में कूट-कोष्ठ आदि अङ्गों को पहले जिस प्रकार कहा गया है, उसी ढंग से निर्मित करना चाहिये। कूट, कोष्ठ एवं नीड आदि भेदों का वर्णन पहले किया जा चुका है।।७६-७७।। पूर्वं तैर्भेदकैर्युक्तस्याख्या धाम्नस्तथा भवेत्। आद्वादशतलादेवं युञ्जीयाद् द्वितलादितः ॥७८॥ कर्णे मध्ये तयोर्मध्ये कूटं कोष्ठं च पञ्जरम्। कर्तव्यं मानसूत्रात्तु तेषां निर्गममुच्यते ॥७९॥ ( कूटादि ) भेदों का जिस भवन में जिस प्रकार प्रयोग करना चाहिये, उसका वर्णन पहले किया जा चुका है। इनका प्रयोग दूसरे तल से प्रारम्भ कर बारह तलपर्यन्त करना चाहिये। भवन के कर्ण ( कोने ) पर कूट, मध्य भाग में कोष्ठ एवं कूट तथा कोष्ठ के मध्य में पञ्जर का निर्माण करना चाहिये। उनके निर्गम का निर्माण मानसूत्र से करना चाहिये।।७८-७९।। स्वव्यासाधं तथार्धार्धं दण्डं वा द्वित्रिदण्डकम्। अन्तर्विन्यासदेशं तु मानसूत्रं न योजयेत् ॥८०॥ ऋजुसूत्रप्रमाणान्तं तदङ्गे विपदां पदम्। तस्मात् कूटादिसर्वाङ्गं मानसूत्राद् बहिर्नयेत् ॥८१॥ निर्गमों का माप ( उस तल ) की चौड़ाई का आधा अथवा उसका भी आधा ( चौड़ाई का चौथाई भाग ) रखना चाहिये या उनका माप एक, दो अथवा तीन दण्ड