मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० मयमतम् होना चाहिये। इसके भीतरी भाग के माप के लिये मानसूत्र का प्रयोग नहीं करना चाहिये। ऋजुसूत्र माप के अन्त तक होता है। इसका बीच में भङ्ग होना विपत्तिकारक होता है; इसलिये कूट आदि सभी अङ्गों का निर्माण मानसूत्र से हटकर करना चाहिये।।८०-८१।। चतुरस्रं तु वस्वस्रं षोडशास्रं तु वर्तुलम्। मस्तकं स्तूपिकोपेतं कूटं कर्णयुतं मतम् ॥८२॥ मध्यनासिसमोपेतमर्धकोटिसमन्वितम् । मुखपट्टिकयोपेतं शक्तिध्वजसमायुतम् ॥८३॥ कर्ण पर निर्मित कूट का शीर्ष चौकोर, अष्टकोण, षोडशकोण अथवा गोलाकार एवं स्तूपिका से युक्त होता है। इसके मध्य भाग में नासि एवं अर्धकोटि निर्मित होता है। यह मुखपट्टिका एवं शक्तिध्वज से युक्त होता है।।८२-८३।। अनेकस्थूपिकोपेतं कोष्ठकं मध्यमे भवेत् । हस्तिपृष्ठनिभं पृष्ठे शालाकारं मुखं मुखे ॥८४॥ पञ्जरं विहितं कूटकोष्ठयोरन्तरे बुधैः । पार्श्ववक्त्रं तदेवेष्टं हस्तितुण्डं समण्डितम् ॥८५॥ अनेक स्तूपिकाओं से युक्त कोष्ठ मध्य में होना चाहिये। इसका पिछला भाग हाथी के पीठ की समान एवं अग्र भाग शाला के आकार का होना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ मध्यपञ्जर होना चाहिये। इसका मुख पार्श्व में होना चाहिये एवं गज-शुण्ड से सुसज्जित होना चाहिये।।८४-८५।। एष जातिक्रमः प्रोक्तः कर्णकोष्ठसमन्वितम् । मध्ये कूटं तयोर्मध्ये क्षुद्रकोष्ठादिशोभितम् ॥८६॥ छन्दमेतत् समुद्दिष्टं कूटं वा कोष्ठकं तु वा । अन्तरप्रस्तरोपेतान्निम्नं वोन्नतमेव वा ॥८७॥ विकल्पमिति निर्दिष्टमाभासं तद्विमिश्रितम् । क्षुद्रालपमध्यमोत्कृष्टं हर्म्याणामेवमीरितम् ॥८८॥ जात्यादिभेदकैर्युक्तं विमानं सम्पदां पदम् । विपरीते विनाशाय भवेदेवेति निश्चयः ॥८९॥ 'जाति' ( भवन का प्रकारविशेष ) का वर्णन इस प्रकार किया गया। ( छन्दभवन में ) भवन के कर्ण ( कोणों ) पर कोष्ठ, मध्य भाग में कूट तथा इन दोनों के मध्य