मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः 卐 चतुर्भूम्यादिबहुभूमिविधानम् २८१ में क्षुद्रकोष्ठ आदि निर्मित हों तो उसे 'छन्द' कहा जाता है। (विकल्प भवन में) कूट या कोष्ठ अन्तर-प्रस्तर से युक्त हों, ऊँचे या नीचे हों तो उस भवन को 'विकल्प' कहा जाता है। 'आभास' भवन में इन दोनों व्यवस्थाओं के मिश्रित रूप का प्रयोग किया जाता है। यह छोटे, मध्यम एवं उत्तम श्रेणी के भवनों के अनुकूल होता है। 'जाति' आदि भेदों से युक्त देवालय सम्पत्ति प्रदान करते हैं। इसके विपरीत रीति से निर्मित देवालय विनाश के कारण बनते हैं॥८९॥ षडष्टास्रे च वृत्ते च द्व्यस्रवृत्ते च तत् क्रमात् । पञ्चाष्टनवपङ्क्त्यंशे व्यासैकांशेन बाह्यतः ॥९०॥ वर्तयेत्तु तदाकृत्या कोटिच्छेदार्थमीरितम् । चतुरस्रस्य नाहेन योजयेत्तु समं यथा ॥९१॥ तया वर्तनया तेषां मानं सम्पूर्णमिष्यते । मानं धाम्नस्तु सम्पूर्णं जगत्सम्पूर्णता भवेत् ॥९२॥ (कूट आदि के) षट्कोण, अष्टकोण, वृत्ताकार, द्व्यस्रवृत्ताकार (दो कोण एवं अगले सिरे पर गोलाई) होने पर उनके व्यास के क्रमशः पाँच, आठ, नौ एवं दश भाग करने चाहिये एवं एक भाग से उसके बाहर उसी की आकृति का घेरा बनाना चाहिये। यहाँ कोटि के छेद के लिये स्थान रक्खा जाता है। चौकोर के घेरे को इस प्रकार रखना चाहिये, जिससे माप सम बना रहे। उनकी वर्तनी से उनका (कूटादि का) मान पूर्ण होता है। यदि भवन का मान पूर्ण होता है तो संसार सम्पूर्णता को प्राप्त होता है (अर्थात् गृहकर्ता को समृद्धि एवं पूर्णता इस संसार में प्राप्त होती है)॥९०-९२॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कुर्यात् संलक्ष्य बुद्धिमान् । एवं संक्षेपतः प्रोक्तं प्रासादानां तु लक्षणम् ॥९३॥ एकादिद्वादशान्तं ह्युदयविपुलभागं करैस्तारमानं चोत्सेधं कूटकोष्ठाद्यवयवकरणं नाहभेदं क्रमेण । प्रोक्तं संक्षिप्य सम्यङ् मुनिभिरवितथैर्ब्रह्मपूर्वैर्यथोक्तं नानाभेदैर्विमानं प्रियतरमनघं तैतलानां मयेन ॥९४॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे चतुर्भूम्यादिबहुभूमि- विधानो नाम द्वाविंशोऽध्यायः इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति को प्रत्येक अङ्ग का निर्माण अत्यन्त सावधानीपूर्वक