भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८९ ✵ अष्टौ परिवाराः ✵ हीनविमानानामथ परिवाराश्चाष्ट वै प्रोक्ताः। प्राकारोऽप्येकः स्यात् पीठपदे चार्यकादिषु वा ॥३९॥ ऋषभगणाधिपकमलजामातृगुहार्याच्युताश्च चण्डेशः। आठ परिवार-देवता--छोटे देवालयों में एक ही प्राकार एवं आठ परिवार- देवता होने चाहिये। यदि पीठ-संज्ञक वास्तु-पद हो तो आर्यक के पद से प्रारम्भ कर ऋषभ, गणाधिप, कमलजा ( लक्ष्मी ), मातृकायें, गुह, आर्य, अच्युत एवं चण्डेश होने चाहिये।।३९।। ✵ द्वादश परिवाराः ✵ उपपीठपदे चान्तर्द्वादश परिवाराः स्थाप्याः ॥४०॥ वृषकमलजगुहहरयः पूर्ववदुदितास्तथार्यकादिपदे। रविगजवदनयमास्ते मातृजलेशौ च दुर्गा च ॥४१॥ धनदश्चण्डः क्रमशः सूर्यपदाद्दिक्षुवामगताः। बारह परिवार-देवता-उपपीठ वास्तुपद पर बारह परिवार-देवताओं की स्थापना करनी चाहिये। पहले की भाँति आर्यक पद से प्रारम्भ कर वृष, कमलजा, गुह एवं हरि होने चाहिये। सूर्य के पद से दाहिनी ओर रवि, गजवदन, यम, मातृकायें, जलेश, दुर्गा, धनद एवं चण्ड क्रमानुसार होने चाहिये।।४०-४१।। ✵ षोडश परिवाराः ✵ षोडश परिवाराः स्युश्चोग्रे पीठे निधातव्याः ॥४२॥ अन्तश्चार्यकभागादिषु वृषभाद्यास्तथा प्राग्वत्। ईशपदे च जयन्ते भृशभागेऽग्नौ च वितथे च ॥४३॥ भृङ्गनृपे पितृसुगले शोषे वायौ च मुख्यकेऽप्युदितौ। चण्डश्चन्द्रः सूर्यो गजवदनः श्रीः सरस्वती चेति ॥४४॥ ता मातरश्च शुक्नो जीवो दुर्गा दितिस्तथाप्युदितिः। षोडश परिवार-देवता-उग्र पीठ-वास्तु पद पर सोलह देव-परिवार स्थापित करना चाहिये। आर्यक पद पर वृष आदि देवों को पहले के सदृश स्थापित करना चाहिये। ईश, जयन्त, भृश, अग्नि, वितथ, भृङ्गनृप, पितृ, सुगल, शोष, वायु, मुख्य एवं उदिति के पद पर क्रमशः चण्ड, चन्द्र, सूर्य, गजवदन, श्री, सरस्वती, मातृकायें, शुक्र, जीव, दुर्गा, दिति एवं उदिति होनी चाहिये।।४२-४४।। मय०-१९