भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 312

२८८ मयमतम् ✵ अधिष्ठानोत्सेधः ✵ प्रतिसालं तु षण्मात्रहीनं स्याच्छेषसालके । क्षुद्रे साष्टादशाङ्गुल्यं मध्यमे मूलपादुकम् ॥३३॥ क्षपयेत्तु चतुर्मात्रैर्यवत् पञ्चान्तसाल कम् । योजयेद् विधिनानेन स्थपतिस्तत्क्रमेण तु ॥३४॥ अधिष्ठान की ऊँचाई—क्षुद्र देवालय में शेष सालों में प्रत्येक साल छः-छः अङ्गुल कम होता जाता है। मध्यम देवालय में अठारह अङ्गुल का अन्तर होता है। प्रत्येक साल में (प्रथम से) पाँचवें तक चार-चार अङ्गुल कम होता जाता है। स्थपति को इसी विधि से साल-योजना करनी चाहिये।।३३-३४।। ✵ परिवारालयविधानम् ✵ परिवारविमानानां मानं गर्भार्धमिष्यते । मूलवस्तुत्रिभागैकं मध्यं वा पादबाह्यकम् ॥३५॥ त्रिचतुष्पञ्चषट्सप्तहस्तैर्वा हर्म्यविस्तृतम् । देव-परिवार के भवन का विधान—परिवार देवालय (प्रधान देव-मूर्ति से पृथक् देव-परिवार का मन्दिर, जो मन्दिर परिसर में बने होते हैं) के गर्भगृह का मान प्रधान देवालय के विस्तार का आधा होता है। इसे तीसरे भाग, आधा, तीन चौथाई के बराबर भी रक्खा जाता है। इस भवन का विस्तार तीन, चार, पाँच, छः या सात हाथ रखना चाहिये।।३५।। अष्टौ वा परिवाराः स्युस्तथा द्वादश षोडश ॥३६॥ द्वात्रिंशत् परिवाराश्च हीष्यन्ते शास्त्रकोविदैः । परिवारामरोत्सेधं युक्त्या तत्रैव योजयेत् ॥३७॥ यदुक्तं सकले बेरे तन्मानं गृह्यतां वरैः । सर्वलक्षणसंयुक्तं स्थानकासनमेव वा ॥३८॥ शास्त्र के ज्ञाताओं के अनुसार आठ, बारह, सोलह या बत्तीस परिवार-देवता होते हैं। परिवार-देवों की मूर्ति की ऊँचाई नियमानुसार होनी चाहिये। जो प्रमाण सकल बेरों (बेरों, पट्टियों पर निर्मित आकृति) के लिये कही गई है, वही प्रमाण श्रेष्ठ स्थपति को ग्रहण करना चाहिये। ये (मूर्तियाँ) सभी लक्षणों से युक्त बैठी या खड़ी मुद्रा में होनी चाहिये।।३६-३८।।