मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८७ अधोभूमित्रिभागे तु द्विभागं चोर्ध्वभूमिकम्। तत्पादाष्टांशहीनं वा बहिर्भित्त्युन्नतं भवेत् ॥२७॥ मालिकाकृतिरेवं वा महावारयुतं तु वा। भित्ति के भीतरी भाग में एक, दो या तीन तल से युक्त आवृतमण्डप का निर्माण करना चाहिये। भित्ति बाहर से सीधी होती है। निचले तल के तीन भाग में से दो भाग के बराबर ऊपरी तल का मान रखना चाहिये। अथवा यह चतुर्थांश या आठवाँ भाग हीन हो सकता है। या इसकी ऊँचाई बाहरी भित्ति के बराबर हो सकती है। यह मालिका की आकृति वाली या महावारं ( बड़ा बरामदा ) से युक्त होती है।।२६-२७।। मानान्तं बाह्यभित्त्युच्चमधो धूमेः स्थलान्तकम् ॥२८॥ मूलसङ्गोत्तरान्तं वा प्रस्तरान्तमथापि वा। खण्डहर्म्योत्तरान्तं वा शिखरान्तोन्नतं तु वा ॥२९॥ बाह्य भित्ति की सबसे अधिक ऊँचाई प्रधान देवालय की निचली भूमि के स्थल- भाग से उत्तर पर्यन्त, प्रस्तर तक, खण्डहर्म्य के उत्तर तक अथवा शिखर पर्यन्त हो सकती है।।२८-२९।। मण्डपं द्वितलं वैकतलं वाऽपि तदावृतम्। अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं समं वाष्टांशहीनकम् ॥३०॥ त्रिपादं वा विशेषेण सालाधिष्ठानतुङ्गतः। द्विगुणं चरणोत्तुङ्गं षडष्टांशोनमेव वा ॥३१॥ दो या एक तलयुक्त मण्डप ( देवालय ) के चारो ओर हो सकता है। यह अधिष्ठान से युक्त, उसके बराबर ऊँचा, आठ भाग कम या तीन चौथाई ऊँचा हो सकता है। मण्डप के स्तम्भ ( अधिष्ठान से ) दुगुने ऊँचे या ( दुगुने से ) आठ या छः भाग कम ऊँचे हो सकते हैं।।३०-३१।। ✹ सालशीर्षालङ्कारः ✹ उक्षं वा भूतरूपं वा कर्तव्यं सालशीर्षके। मूलजन्मतलं हस्तमात्रोच्चं जन्मसालातः ॥३२॥ प्राकार के शीर्षभाग के अलङ्करण—साल ( प्राकार ) के शीर्षभाग पर वृषभ या भूतों का स्वरूप अङ्कित करना चाहिये। मूल देव-भवन का जन्मतल ( अधिष्ठान ) साल के जन्म से एक हाथ ऊँचा रखना चाहिये।।३२।।