मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ मयमतम् होनी चाहिये। अग्र भाग ( ऊपरी भाग ) का विस्तार ( मूल से ) आठ भाग कम होना चाहिये।।१८-१९।। उत्तरान्तोचिता वाऽपि कुम्भमण्ड्यन्तकोदयाः ॥२०॥ मसूरकादिवर्गाढ्याः खण्डहर्म्याभिमण्डिताः । ऋजुभित्तियुता वाऽपि बुद्बुदार्धेन्दुशीर्षकाः ॥२१॥ प्राकार की ऊँचाई उत्तर के अन्त तक या ( स्तम्भ के ) कुम्भ या मण्डि तक रखनी चाहिये। प्राकार को मसूरक से युक्त एवं खण्डहर्म्य से सुसज्जित होना चाहिये। यह भित्ति सीधी हो अथवा बुद्बुद ( गोल सजावटी बिन्दु ) या अर्धचन्द्र उसके शीर्ष भाग पर सुसज्जित होना चाहिये।।२०-२१।। क्षुद्राल्पानां तु सालानां भित्तिर्हस्तप्रमाणतः । सार्धहस्ताद्विधार्यावत् पूर्ववद् वर्धयेत् क्रमात् ॥२२॥ ( छोटे देवालयों के ) सबसे छोटे मन्दिर के सालों की भित्ति ( प्राकारों की मोटाई ) हस्त-प्रमाण से होती है। इसे डेढ़ हाथ से प्रारम्भ होकर पूर्व-वर्णित रीति ( तीन-तीन अङ्गुल ) से क्रमानुसार बढ़ाना चाहिये।।२२।। सोत्तरा वाजनच्छत्रशीर्षाभाः सालभित्तयः । भित्तिव्याससमोत्तुङ्गं पादार्धाधिकमेव वा ॥२३॥ तदुच्चे रुद्रभागेऽप्यग्निमोक्षोऽक्षिशिवांशकैः । उत्तरं वाजनाब्जं च क्षेपणं च यथाक्रमम् ॥२४॥ ऋजुभित्तियुतं ह्येतत् खण्डहर्म्याभिमण्डितम् । अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं निर्गमोद्गमसंयुतम् ॥२५॥ प्राकार-शीर्ष उत्तर, वाजन एवं छत्र से युक्त होता है। इसकी ऊँचाई भित्ति की चौड़ाई के बराबर, सवा भाग या डेढ़ भाग अधिक होनी चाहिये। ऊँचाई को ग्यारह भागों में बाँटना चाहिये। तीन भाग से उत्तर, तीन भाग से वाजन, दो भाग से अब्ज एवं तीन भाग से क्षेपण की क्रमानुसार योजना करनी चाहिये। भित्ति ( का बाहरी भाग ) सीधा अथवा खण्डहर्म्य से युक्त हो सकता है। यह अधिष्ठान से प्रारम्भ होकर ( ऊँचाई पर ) निर्गम से युक्त होता है।।२३-२५।। ✳ आवृतमण्डपम् ✳ एकद्वित्रितलोपेतं कुर्यादावृतमण्डपम् । अभ्यन्तरे बहिष्ठात्तु ऋजुभित्तियुता भवेत् ॥२६॥