मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २८५ उत्तमानां स्वतारार्धमाद्यं सालं प्रकीर्तितम् । तत्समं सप्तहस्तेन संयुक्तं स्याद् द्वितीयकम् ।।१३।। नवहस्ताधिकं तस्मात् तृतीयं सालमुच्यते । तस्मादेकादशाधिक्यं तत्समं तु चतुर्थकम् ।।१४।। त्रयोदशकरैर्युक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् । एवं क्षुद्राल्पमध्यानामुत्कृष्टानां प्रकीर्तितम् ।।१५।। (छोटे देवालयों के) उत्तम श्रेणी के देवालयों का प्रथम साल उसकी चौड़ाई के आधे माप की दूरी पर होना चाहिये। दूसरा साल सात हाथ की दूरी पर, तीसरा नौ हाथ की दूरी पर, चौथा ग्यारह हाथ की दूरी पर एवं पाँचवाँ तेरह हाथ की दूरी पर होना चाहिये। इस प्रकार अत्यन्त छोटे, क्षुद्र-मध्यम एवं क्षुद्र-उत्तम कोटि के देवालय के सालों (प्राकारों) का वर्णन किया गया।।१३-१५।। एतेन कारयेद् धीमान् पूर्वोक्तेन क्रमेण वा । प्राकारं परितस्तस्मान्मुखायामं तु पूर्ववत् ।।१६।। भित्त्यभ्यन्तरमानेन मानयेन्मानवित्तमः । भित्तिमध्येन बाह्येन कैश्चिदुक्तं तु सूरिभिः ।।१७।। बुद्धिमान व्यक्ति को इस विधि से या पूर्वोक्त क्रम से चारो ओर प्राकार की रचना करनी चाहिये। इसके मुखभाग की लम्बाई पूर्व-वर्णित रखनी चाहिये। माप के ज्ञाता भित्ति के भीतर से माप लेते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार भित्ति के मध्य से एवं कुछ के अनुसार भित्ति के बाहर से माप लेना चाहिये।।१६-१७।। ✺ प्राकारभित्तिः ✺ अन्तर्मण्डलभित्तेश्च विष्कम्भं सार्धहस्तकम् । तस्मात् त्रित्र्यङ्गुलाधिक्याद् द्विहस्तान्तं यथाक्रमम् ।।१८।। पञ्चानामपि सालानां विष्कम्भं परिगृह्यताम् । तत्तद्विष्कम्भमानेन त्रिगुणं वा चतुर्गुणम् ।।१९।। प्राकारोदयमुद्दिष्टं स्वाष्टांशोनाग्रविस्तरम् । अन्तर्मण्डल की भित्ति का विष्कम्भ (मोटाई) डेढ़ हाथ होना चाहिये। इसके आगे के प्राकारों के विष्कम्भों का माप तीन-तीन अङ्गुल बढ़ाते हुये दो हाथ तक क्रमानुसार ले जाना चाहिये। पाँचों सालों (प्राकारों) का विष्कम्भ इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये। उनके विष्कम्भ-मान से उनकी ऊँचाई तीन गुनी या चार गुनी अधिक