भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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२८४ मयमतम् मध्य साल ( तृतीय ) 'उभयचण्डित' ( एक सौ उनहत्तर पद ) संज्ञक, चौथा 'सुसंहित' ( चार सौ इकतालीस ) संज्ञक एवं पाँचवाँ 'ईशकान्त' ( नौ सौ इकसठ पद ) संज्ञक होता है।।४-५।। चतुरस्त्रीकृते तेन मुखायाममिहोर्ध्वतः । पादाधिकमथाध्यर्धं पादोनद्विगुणं क्रमात् ॥६॥ द्विगुणं द्विगुणार्धं च त्रिगुणं वा चतुर्गुणम् । मुखायाममिति प्रोक्तं प्राकाराणां विशेषतः ॥७॥ चतुष्कोण क्षेत्र के अग्र भाग की लम्बाई का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। यह लम्बाई ( मन्दिर के चौड़ाई की ) क्रमशः सवा, डेढ़, तीन चौथाई एवं दुगुनी होती है। प्राकारों के अग्र भाग की लम्बाई दुगुनी, ढाई गुनी, तीन गुनी या चार गुनी कही गई है।।६-७।। क्षुद्राणामल्पहर्म्याणां स्वव्यासार्धप्रमाणतः । अन्तर्मण्डलकं कुर्यात् सत्रिहस्तं तु तत्समम् ॥८॥ द्वितीयं हि तृतीयं तु तस्मात् पञ्चकराधिकम् । तस्मात् ससप्तहस्तं तु तत्समं स्याच्चतुर्थकम् ॥९॥ छोटे मन्दिरों में भी अत्यन्त छोटे मन्दिर की चौड़ाई के डेढ़ भाग की दूरी पर ( प्रथम प्राकार ) 'अन्तर्मण्डल', उसके आगे उतनी ही दूरी तीन हाथ पर दूसरा प्राकार, उससे पाँच हाथ दूरी पर तीसरा प्राकार, उससे सात हाथ की दूरी पर चौथा प्राकार एवं नौ हाथ की दूरी पर पाँचवाँ प्राकार होना चाहिये।।८-९।। नवहस्तसमायुक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् । मध्यमानां स्वतारार्धमन्तर्मण्डलमिष्यते ॥१०॥ तत्समं पञ्चहस्तेन संयुक्तं स्याद् द्वितीयकम् । सप्तहस्ताधिकं तस्मात् सालमुक्तं तृतीयकम् ॥११॥ नवहस्ताधिकं तस्माच्चतुर्थं सालमीरितम् । एकादशकरैर्युक्तं तत्समं पञ्चमं भवेत् ॥१२॥ ( छोटे मन्दिर के ) मध्यम कोटि के देवालय की चौड़ाई के आधे माप की दूरी पर अन्तरमण्डल की रचना की जाती है। दूसरा प्राकार पाँच हाथ की दूरी पर होता है। तीसरा साल ( प्राकार ) सात हाथ की दूरी पर, चतुर्थ साल नौ हाथ की दूरी पर एवं पाँचवाँ ग्यारह हाथ की दूरी पर होना चाहिये।।१०-१२।।