मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ मयमतम् मध्यहार एवं अन्तर्हार के बीच में मालिका-पङ्क्ति निर्मित होनी चाहिये। यह एक, दो, तीन, चार या पाँच तल की होनी चाहिये। दीवार के ऊपर दीवार एवं स्तम्भ के ऊपर स्तम्भ निर्मित होना चाहिये। भित्ति के ऊपर स्तम्भ निर्मित हो सकते हैं; किन्तु स्तम्भ के ऊपर भित्ति नहीं निर्मित होनी चाहिये। मालिका-पङ्क्ति को कूट एवं कोष्ठ आदि से युक्त एवं जालभित्ति से अलङ्कृत होना चाहिये। यह मण्डप के आकृति की, शाला या सभा के आकृति की होनी चाहिये ।।५८-६०।। भक्तिमानं तथा पादायामं संक्षिप्य वक्ष्यते ॥६१॥ मूलधाम्नस्तूत्तरान्तमुपानाद्युन्नतं क्रमात् । सप्तभागैः समं कृत्वा द्व्यंशं मसूरकोन्नतं ॥६२॥ पादायामं तु पञ्चांशं पादं सर्वाङ्गसंयुक्तम् । अथवा पादमानं तु नवभागैर्विभाजयेत् ॥६३॥ अधिष्ठानं द्विभागं स्याच्छेषं पादोदयं भवेत् । सार्धद्विहस्तमारभ्य षट्षडङ्गुलवर्धनात् ॥६४॥ षड्ढस्तान्तं समुत्सेधं स्तम्भं त्रिः पञ्चसंख्यया । भित्त्यभ्यन्तरतस्तावदेवं तस्या विशालता ॥६५॥ भक्त्यायामं च तावत् स्यात् क्षुद्रे महति मन्दिरे । षडङ्गुलात् समारभ्य वाङ्गुलाङ्गुलवर्धनात् ॥६६॥ विंशन्मात्रावधिर्यावत् पादविष्कम्भमिष्यते । अब भक्तिमान ( विभाजन, दूरी ) एवं स्तम्भ का आयाम संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है। प्रधान देवभवन के उपानत् ( अधिष्ठान का ऊपरी भाग ) से उत्तरपर्यन्त की दूरी को सात बराबर भागों में बाँट कर दो भाग से मसूरक ( अधिष्ठान ) की ऊँचाई एवं पाँच भाग से स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। स्तम्भ को सभी अङ्गों से युक्त निर्मित करना चाहिये या स्तम्भ के प्रमाण को नौ भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग से अधिष्ठान एवं शेष भाग से स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। ढ़ाई हाथ से प्रारम्भ कर छः-छः अङ्गुल बढ़ाते हुये छः हाथ तक स्तम्भ की ऊँचाई रखनी चाहिये। इस प्रकार स्तम्भों की ऊँचाई पन्द्रह प्रकार की हो सकती है। भीतरी भित्ति की मोटाई के अनुसार स्तम्भ की चौड़ाई होनी चाहिये। यह भक्तिमान एवं लम्बाई छोटे एवं बड़े सभी देवालयों के लिये समान है। अथवा छः अङ्गुल से प्रारम्भ करके एक-एक अङ्गुल बढ़ाते हुये बीस अङ्गुलपर्यन्त पादविष्कम्भ ( स्तम्भ की चौड़ाई ) रखना चाहिये। पादोच्चार्धमधिष्ठानं षडष्टांशोनमेव वा ॥६७॥