भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९३ पादोदयत्रिभागैकं चतुर्भागैकमेव वा। पादबन्धमधिष्ठानं चारुबन्धमथापि वा ॥६८॥ पादोनमप्यलङ्कारं प्रस्तरस्याप्यलङ्कृतम्। पूर्वोक्तेन प्रकारेण युक्त्या तत्रैव योजयेत् ॥६९॥ अधिष्ठान की ऊँचाई स्तम्भ की ऊँचाई का आधा, छः या आठ भाग कम या स्तम्भ की ऊँचाई का तीसरा अथवा चौथा भाग रखना चाहिये। यह अधिष्ठान पादबन्ध या चारुबन्ध शैली का होना चाहिये। इसका चतुर्थांश कम प्रस्तर होना चाहिये, जो अलङ्करणों से सुसज्जित हो। इस प्रकार पूर्ववर्णित रीति से उचित ढंग से निर्माणकार्य करना चाहिये॥६७-६९॥ खलूरिका मनुष्याणां वासेष्वेवमुदीरिताः। प्रथमावरणाद्यावत् त्रिप्राकारान्तमावृतिः ॥७०॥ (जिस प्रकार देवालय में मालिका) उसी प्रकार मनुष्यों के आवास में खलूरिका का निर्माण गृह के चारो ओर होना चाहिये, जो प्रथम आवरण (प्राकार) से लेकर तीसरे प्राकार तक होता है॥७०॥ यथेष्टदिशि हि द्वारं युक्त्या युक्तं नृणां मतम्। परिवारविमानानि तत्तदुक्तपदे क्रमात् ॥७१॥ आर्यात्पूर्वोक्तनीत्या तु प्रासादाभिमुखान्यपि। नृत्तमण्डपपीठादि परिवाराद् बहिः पुरः ॥७२॥ स्नानार्थं मण्डपं वाऽपि नृत्तमण्डपमेव वा। परिवारालयान्तैर्वा कर्तव्यं स्वप्रमाणतः ॥७३॥ उनके द्वारों को अभीप्सित दिशा में मनुष्यों के भवन में कहे गये नियम के अनुसार स्थापित करना चाहिये। (मालिकापङ्क्ति में) परिवार-देवालयों को जिन-जिन पदों में कहा गया है, उन्हें क्रमानुसार वहीं निर्मित करना चाहिये। आर्यक के पद से प्रारम्भ करते हुये पूर्ववर्णित नियम के अनुसार देवालय की ओर उन्मुख बनाना चाहिये। इन परिवार-देवालयों के बाहर नृत्य-मण्डप एवं पीठ (वेदी) आदि का निर्माण करना चाहिये अथवा स्नान-मण्डप एवं नृत्य-मण्डप परिवारदेवालय के भीतर भी प्रमाण के अनुसार निर्मित हो सकता है॥७१-७३॥ ✵ पीठलक्षणम् ✵ गर्भगृहार्धेन समौ पीठव्यासोच्छ्रयौ मतौ। एकद्वित्रिकरव्यासोत्सेधं वा बलिविष्टरम् ॥७४॥