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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२९४ मयमतम् गोपुरात्तु बहिः पीठं प्रासादार्धेन निर्गमम् । तत्समं वा त्रिपादं वा निर्गमं बलिविष्टरम् ॥७५॥ पञ्चानामपि सालानामारान् पैशाचमग्रतः । पैशाचपीठप्रासादमध्ये तु बलिविष्टरम् ॥७६॥ पीठ के लक्षण—गर्भगृह के व्यास के आधे प्रमाण से दो पीठों की चौड़ाई एवं ऊँचाई रखनी चाहिये। बलिविष्टर ( जहाँ बलि दी जाय ) की ऊँचाई एवं चौड़ाई एक, दो या तीन हाथ होनी चाहिये। ( पिशाच ) पीठ को गोपुर से बाहर प्रसाद की चौड़ाई के आधे भाग की दूरी पर निर्मित करना चाहिये। बलिविष्टर की गोपुर से दूरी उपर्युक्त माप के बराबर अथवा तीन चौथाई होनी चाहिये। पिशाचपीठ को पाँचों प्राकारों के बाहर एवं मन्दिर के सम्मुख होना चाहिये तथा बलिविष्टर को पिशाचपीठ एवं प्रासाद के मध्य में निर्मित करना चाहिये॥७४-७६॥ पीठोत्सेधे षोडशभागे भागेन जन्मं स्यात् । जगती चतुरंशेन कुर्यात् कुमुदं त्रि

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