मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९५ ☀ ध्वजस्थानम् ☀ वृषभस्याग्रतः कुर्यात् प्रसादार्धप्रमाणतः। ध्वजस्थानं तदग्रे तु तन्नीत्वा त्रिशिखालयम् ॥८२॥ एते वृषादयः सर्वे चान्तर्वमे तु गोपुरात्। प्रासाद के आधे माप से वृषभ के अग्र भाग में ध्वजस्थान का निर्माण होना चाहिये एवं आगे त्रिशिखालय (त्रिशूल) होना चाहिये। ये सभी वृष आदि गोपुर के वाम भाग में (प्राकार के) भीतर होने चाहिये॥८२॥ ☀ प्राकाराश्रितस्थानानि ☀ मर्यादिसालमाश्रित्य पावके हव्यकोष्ठकम् ॥८३॥ अग्निगोपुरयोर्मध्ये धनधान्यगृहं भवेत्। याम्ये मज्जनशाला स्यात्तत्रस्थं पुष्पमण्डपम् ॥८४॥ प्राकार के आश्रित स्थान—मर्यादि साल (प्राकार) से सटा कर आग्नेय कोण में हवि का प्रकोष्ठ होना चाहिये। अग्निकोण एवं गोपुर के मध्य में धन-धान्य का गृह होना चाहिये। यम के प्रकोष्ठ पर मज्जनशाला (स्नानमण्डप) एवं वहीं पुष्पमण्डप निर्मित होना चाहिये॥८३-८४॥ नैर्ऋतिस्थानमाश्रित्य कुर्यादायुधमण्डपम्। वरुणे वायुदेशे तु शयनस्थानमिष्यते ॥८५॥ निर्ऋति के स्थान पर अस्त्र-मण्डप एवं वरुण तथा वायु के स्थान पर शयनस्थान निर्मित करना चाहिये॥८५॥ सौम्यायां तु प्रकर्त्तव्यं धर्मश्रवणमण्डपम्। ईशे वापी च कूपं स्यादापवत्सपदाश्रितम् ॥८६॥ ईशगोपुरयोर्मध्ये वाद्यस्थानं प्रकीर्तितम्। आरादीशे विमानस्य स्थानं चण्डेश्वरस्य वा ॥८७॥ पूर्वोक्तस्थानदेशे वा कर्तव्यं भवनं बुधैः। सोम के पद पर धर्मश्रवण-मण्डप (जहाँ धर्मसभा, धर्मविषयक प्रवचन होते हों) होना चाहिये। ईश के पद पर एवं आपवत्स के पद पर वापी एवं कूप होना चाहिये। ईश एवं गोपुर के मध्य स्थल में वाद्यस्थान होना चाहिये। विमान के निकट ही ईश के पद पर चण्डेश्वर का स्थान होना चाहिये। अथवा पूर्ववर्णित स्थान पर बुद्धिमान को निर्माण करना चाहिये॥८६-८७॥