मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ मयमतम् ❋ शक्तिस्तम्भः ❋ शक्तिस्तम्भं पीठात्पुरतो विद्याद्विमानमानेन ।।८८।। क्षुद्राणां द्विगुणोदयमल्पयानां तत्समं विद्यात्। मध्यविमानानामपि तुङ्गार्धं वा त्रिपादोच्चम् ।।८९।। उदयत्रिभागमुदितं वाऽर्धं वोत्कृष्टहर्म्याणाम्। हस्तं षोडशमात्रं द्वादशदशमात्रकं विपुलम् ।।९०।। मण्डीकुम्भयुतं तत्फलकोऽर्ध्वे भूतमुक्षा वा। शैलं दारुमयं वा वृत्तं वाष्टास्रकं द्विरष्टास्रम् ।।९१।। (विमान के) पीठ के सामने विमान के मान के अनुसार शक्तिस्तम्भ होना चाहिये। क्षुद्र (अत्यन्त छोटे) मन्दिर की ऊँचाई के दुगुने माप की शक्तिस्तम्भ की ऊँचाई होनी चाहिये। अल्प (छोटे) विमान का शक्तिस्तम्भ उसके बराबर माप का तथा मध्यम विमान में उसकी ऊँचाई का आधा या तीन चौथाई माप का शक्तिस्तम्भ होना चाहिये। उत्तम विमान में उसकी ऊँचाई के तीसरे या आधे भाग के बराबर शक्तिस्तम्भ की ऊँचाई होनी चाहिये। इसकी चौड़ाई एक हाथ, सोलह अङ्गुल या दश अङ्गुल होनी चाहिये। शक्तिस्तम्भ को मण्डि एवं कुम्भ से युक्त होना चाहिये एवं उसके ऊपर भूत या वृषभ की आकृति होनी चाहिये। यह भाग प्रस्तर या काष्ठ से निर्मित होना चाहिये तथा इसे वृत्ताकार, अष्टकोण या सोलह कोण का होना चाहिये। ❋ इतरस्थानानि ❋ वेशस्थानं वापी कूपारामौ च दीर्घिका चैव। सर्वत्र सम्मतं स्यान्मठभुक्तिनिकेतनं चापि ।।९२।। अन्य स्थान—वेशस्थान (पुरोहित का आवास), वापी (बावड़ी), कूप, बगीचा एवं दीर्घिका (तालाब) सभी स्थानों में (कहीं भी) हो सकते हैं। इसी प्रकार मठ एवं भोजनशाला भी कहीं भी निर्मित हो सकते हैं।।९२।। नान्तर्मण्डलमथ वा चान्तर्हारं तथैकसालं चेत्। अन्तर्हारा मध्यमहारा मर्यादाभित्तिश्च ।।९३।। त्रिप्राकारेऽप्युदिताः पञ्चयुताः पञ्चसालाः स्युः। एषां प्रकाराणामुपरि वृषाः स्युः सपङ्क्तिकाः परितः ।।९४।। यदि विमान में एक प्राकार हो तो वह अन्तर्मण्डल न होकर अन्तर्हार होता है। यदि तीन प्राकार हों तो वे अन्तर्हार, मध्यमहार एवं मर्यादाभित्ति होते हैं। यदि पाँच प्राकार हों (तो वे पूर्ववर्णित होते हैं)। इन प्राकारों के ऊपर चारो ओर पङ्क्ति में वृषभों की आकृतियाँ निर्मित होती हैं।।९३-९४।।