मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९७ शक्तिस्तम्भात् पुरतस्त्रिचतुःपञ्चान्तरालयं नीत्वा। गणिकागृहमथ पार्श्वद्वये तु संवाहिकासहितम् ॥९५॥ प्राकारबहिः परितो वासं परिवारकाणां तु। दासीनामपि तद्वत् पुरतो वा वासमुद्दिष्टम् ॥९६॥ यमदिशि गुरुमठमुदितं पूर्वस्मिन् वाऽप्यवाग्वदनम्। शेषमनुक्तं सर्वं कुर्याद् राजोपचारेण ॥९७॥ शक्तिस्तम्भ से पूर्व प्रधान देवालय की चौड़ाई के तीन, चार या पाँच गुनी दूरी पर गणिकागृह एवं उसके दोनों पाश्र्वों में संवाहिका-स्थान होना चाहिये। प्राकार के बाहर चारो ओर ( मन्दिर के ) सेवकों का आवास होना चाहिये। इसी प्रकार दासियों का आवास होना चाहिये अथवा पूर्व दिशा में सेवकादिकों का आवास होना चाहिये। गुरुमठ ( प्रधान पुजारी का स्थान ) दक्षिण दिशा में होना चाहिये अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिये, जिसका मुख दक्षिण दिशा में हो। शेष के विषय में, जो नहीं कहा गया है, वह सब राजा के अनुसार करना चाहिये।।९५-९७।। ❋ विष्णुपरिवारकम् ❋ विष्णुधिष्ण्येऽहमद्यापि वक्ष्यामि परिवारकम् । प्रमुखे वैनतेयश्च वह्नौ गजमुखालयम् ॥९८॥ यमे पितामहः सप्तमातरः पितरीरिताः । गुहो जलेशे वायव्ये दुर्गा सोमे धनाधिपः ॥९९॥ सेनापतिरथैशाने पीठादीनां तु पूर्ववत्। विष्णु-देवालय के परिवार-देवता—अब मैं विष्णुभवन के परिवारदेवों के विषय में कहता हूँ। प्रमुख स्थान ( पूर्व में ) वैनतेय ( गरुड़ ), अग्निकोण में गजमुख, दक्षिण में पितामह एवं पितृपद पर सप्त मातृकायें कही गई हैं। जलेश के पद पर गुह, वायव्य कोण में दुर्गा, सोम के पद पर धनाधिप कुबेर तथा ईशान कोण पर सेनापति का स्थान होना चाहिये। पीठ आदि की स्थिति पूर्ववर्णित नियमों के अनुसार होनी चाहिये।।९८-९९।। प्राकारोऽप्येक एवं स्यादुच्यन्ते द्वादशाधुना ॥१००॥ विष्णोरभिमुखं चक्रं गरुडस्तत्प्रदक्षिणे। शङ्खो वामे बहिर्वक्त्राश्चैते सकलरूपिणः ॥१०१॥ सूर्यचन्द्रमसौ पाश्र्वे गोपुरस्यान्तराननौ। वह्नौ पचनगेहं स्याच्छेषं पूर्ववदाचरेत् ॥१०२॥