भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२९८ मयमतम् ( उपर्युक्त व्यवस्था ) एक प्राकार होने पर इस प्रकार होनी चाहिये। अब बारह परिवारदेवों का वर्णन किया जा रहा है। विष्णु के सामने चक्र, उसके दाहिने गरुड एवं वाम भाग में शङ्ख होना चाहिये। ये सभी सकल ( मूर्तिरूप में ) हों एवं इनका मुख बाहर की ओर होना चाहिये। सूर्य एवं चन्द्रमा गोपुर के दोनों पार्श्वों में निर्मित हों एवं इनका मुख भीतर की ओर होना चाहिये। आग्नेय कोण में हविष को पकाने का स्थान होना चाहिये एवं शेष निर्माण पूर्ववर्णित नियम के अनुसार होना चाहिये। मध्यान्तर्हारयोरेव परिवारास्तु षोडश। मण्डपस्याग्रतः कुर्यात्पक्षिराजं तु पीठकम् ॥१०३॥ लोकेशाः क्रमशः स्थाप्यास्तत्तद्देशे शिवं विना। आदित्यश्च भृगुश्चैवमश्विनौ च सरस्वती ॥१०४॥ पद्मा च पृथिवी चैव मुनयः सचिवस्तथा। द्वारपालकमध्यादिष्वन्तराले तु कीर्तिताः। द्वात्रिंशत्परिवारांश्च युक्त्या तत्रैव योजयेत् ॥१०५॥ जहाँ सोलह परिवारदेवों की स्थापना करनी हो, वहाँ उनकी स्थापना मध्यहार एवं अन्तर्हार के बीच में करनी चाहिये। मण्डप के आगे पक्षिराज ( गरुड ) एवं पीठ होना चाहिये। शिव को छोड़कर सभी लोकपालों को उनके स्थानों पर स्थापित करना चाहिये। कोण एवं द्वारपालों के मध्य भाग में आदित्य, भृगु, दोनों अश्विनीकुमार, सरस्वती, पद्मा, पृथिवी, मुनिगण एवं सचिवदेवों को स्थापित करना चाहिये। यदि देवपरिवार की संख्या बत्तीस हो तो उन्हें वहीं उचित रीति से स्थापित करना चाहिये। चण्डप्रचण्डरथनेमिसपाञ्चजन्य- दुर्गागणेशरविचन्द्रमहानुभावाः । सर्वेश्वरः सुरपतिश्च तथा दशैते प्राकारपञ्चमुखगोपुरकल्पनीयाः ॥१०६॥ चण्ड, प्रचण्ड, रथनेमि, पाञ्चजन्य, दुर्गा, गणेश, रवि तथा चन्द्र—इन सभी महान् देवों को तथा सर्वेश्वर एवं सुरपति—इन दस को पाँचों प्राकारों के गोपुर की ओर मुख किये हुये निर्मित करना चाहिये ।।१०६।। ❋ वृषलक्षणम् ❋ वृषस्य लक्षणं सम्यक् संक्षिप्येह प्रवक्ष्यते ॥१०७॥ द्वारलिङ्गसमं श्रेष्ठं चतुरंशविहीनकम्। मध्यमं त्रिद्विभागोच्चं कन्यसं वृषभोदयम् ॥१०८॥