मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् २९९ गर्भाधं कन्यसं नालीगेहतुल्यं वरोदयम् । तदन्तरेऽष्टभागे तु नवमानमुदीरितम् ।।१०९।। एकादिनवहस्तान्तं कनिष्ठादित्रयं त्रयम् । पञ्चाशदंशकं तुङ्गमेकांशमात्रमीरितम् ।।११०।। वृषभ के लक्षण—वृष ( की प्रतिमा ) का लक्षण अब संक्षेप में वर्णित किया जा रहा है। श्रेष्ठ वृष की ऊँचाई द्वार के बराबर या लिङ्ग के बराबर होती है। मध्यम वृष उससे चार भाग कम एवं छोटा वृष तीन भाग में दो भाग के बराबर ऊँचा होता है। ( अथवा ) छोटे वृष की ऊँचाई गर्भगृह की ऊँचाई की आधी होती है एवं श्रेष्ठ वृष की ऊँचाई गर्भगृह के बराबर होती है। इन दो ऊँचाई के मध्य के अन्तर को आठ भागों में बाँटा गया है। इस प्रकार एक हाथ से लेकर नौ हाथ तक कनिष्ठ आदि तीन ( उत्तर, मध्यम, कनिष्ठ ऊँचाई वाले ) वृषों के तीन-तीन भेद बनते हैं। इसमें एक अंश ( अङ्गुलप्रमाण ) का माप मूर्ति की ऊँचाई के पन्द्रहवें भाग के बराबर कहा गया है।।१०७-११०।। पञ्चाष्टाङ्गुलमायामं तन्मानमधुनोच्यते । मूर्ध्नस्तु गलपर्यन्तं दशमात्रं ततस्त्वधः ।।१११।। ग्रीवोच्चमष्टमात्रं स्यादुरोऽन्तं षोडशाङ्गुलम् । ऊरुदैर्घ्यं च षण्मात्रं जानुमानं द्विमात्रकम् ।।११२।। जङ्घादीर्घं षडङ्गुल्या खुरं कोलकमुच्यते । शृङ्गान्तरं द्विमात्रं स्याच्छृङ्गदैर्घ्यं द्विकोलकम् ।।११३।। इसकी लम्बाई चालीस अङ्गुल होती है। इसके प्रमाण का वर्णन अब किया जा रहा है। शिर के ऊर्ध्व भाग से लेकर गले तक का माप दस अङ्गुल होता है। इसके पश्चात् उसके नीचे गले का माप आठ अङ्गुल तथा गले से ऊरू भाग के अन्त तक का माप सोलह अङ्गुल होता है। ऊरू की लम्बाई का प्रमाण छः अङ्गुल एवं जानु ( घुटने ) का माप दो अङ्गुल होता है। जङ्घा ( घुटने के नीचे का भाग ) की लम्बाई छः अङ्गुल एवं खुर की लम्बाई कोलक ( दो अङ्गुल ) होती है। दोनों सींगों के मध्य की दूरी दो अङ्गुल तथा सींग की लम्बाई दो कोलक ( चार अङ्गुल ) होनी चाहिये। मूलव्यासं त्रिभागेन शृङ्गाग्रं तु द्विमात्रकम् । ललाटं नवमात्रं स्यान्मुखव्यासं शराङ्गुलम् ।।११४।। उत्सेधं तत्समं नेत्रायामं द्व्यङ्गुलमीरितम् । सार्धाङ्गुलं तदुत्सेधं नेत्रमध्यान्मुखायातम् ।।११५।।