भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३०० मयमतम् वसुमात्रं ततः पृष्ठं ग्रीवान्तं तु षडङ्गुलम् । नेत्रमध्याल्ललाटोच्चं चतुर्मात्रं प्रकीर्तितम् ॥११६॥ सींग के निचले भाग का व्यास तीन अङ्गुल से एवं ऊपरी सिरा दो अङ्गुल का होना चाहिये। वृष का ललाट नौ अङ्गुल का एवं मुख का व्यास पाँच अङ्गुल का होना चाहिये। मुख की ऊँचाई उसकी चौड़ाई के बराबर रखनी चाहिये। नेत्रों की लम्बाई दो अङ्गुल एवं उसकी ऊँचाई (चौड़ाई के) डेढ़ अङ्गुल होनी चाहिये। नेत्रों के मध्य में मुखभाग की लम्बाई आठ अङ्गुल होनी चाहिये। इसके पश्चात् पृष्ठभाग ग्रीवा के अन्त तक छः अङ्गुल होनी चाहिये। नेत्र के मध्य से ललाट की ऊँचाई चार अङ्गुल कही गई है॥११४-११६॥ नेत्रात्कर्णान्तरं तावत्कर्णायामं शराङ्गुलम् । कर्णमूलं द्विमात्रं स्याद्भागं कर्णस्य मध्यमम् ॥११७॥ अग्रमङ्गुलविस्तारं घनमर्धाङ्गुलं भवेत् । नेत्र से कान की दूरी कान की लम्बाई के बराबर होनी चाहिये एवं कान की लम्बाई पाँच अङ्गुल होनी चाहिये। कानों को मूल में दो अङ्गुल चौड़ा, मध्य में दो अङ्गुल चौड़ा एवं ऊपरी भाग एक अङ्गुल चौड़ा होना चाहिये। इनकी मोटाई आधी अङ्गुल होनी चाहिये॥११७॥ घ्राणं सार्धाङ्गुलायाममङ्गुलं गाढविस्तृतम् ॥११८॥ अङ्गुलं नासिकातुङ्गमास्यं पञ्चाङ्गुलायतम् । उत्तरोष्ठं त्रिमात्रोच्चमधरोष्ठं द्विमात्रकम् ॥११९॥ नाक की लम्बाई डेढ़ अङ्गुल, चौड़ाई एक अङ्गुल तथा ऊँचाई एक अङ्गुल होनी चाहिये। मुख की लम्बाई पाँच अङ्गुल, ऊपरी ओठ तीन अङ्गुल तथा निचला ओठ दो अङ्गुल होना चाहिये॥११८-११९॥ जिह्वायामविशालोच्चं त्रिद्व्येकाङ्गुलमीरितम् । ग्रीवाव्यासं दशाङ्गुल्या मूलं द्वादशमात्रकम् ॥१२०॥ मूलेऽग्रे च घनं पृष्ठे ग्रीवस्याष्टषडङ्गुलम् । ककुत् षडङ्गुलव्यासमुत्सेधं तु तदर्धकम् ॥१२१॥ जिह्वा की लम्बाई तीन अङ्गुल, चौड़ाई दो अङ्गुल एवं ऊँचाई (मोटाई) एक अङ्गुल होनी चाहिये। ग्रीवा का व्यास दश अङ्गुल एवं उसका निचला भाग बारह अङ्गुल होना चाहिये। पृष्ठ पर इसका मूल भाग आठ अङ्गुल एवं शीर्ष के नीचे छः अङ्गुल होना चाहिये। ककुत् (पीठ का उभरा भाग) का व्यास छः अङ्गुल एवं इसकी ऊँचाई चौड़ाई की आधी होनी चाहिये॥१२१॥