भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् ३०१ ग्रीवस्याग्रविशालं तु द्विमात्रं युक्ततो न्यसेत् । ककुदस्तु शरीरोच्चं त्रिःषडङ्गुलमीरितम् ॥१२२॥ द्विःसप्तमात्रकं पृष्ठे व्यासं द्वादशमात्रकम् । अपरोरुविशालं तु दशाष्टचतुरङ्गुलम् ॥१२३॥ ग्रीवा के अग्र भाग में ककुत् की चौड़ाई दो अङ्गुल होनी चाहिये। ककुत् तक शरीर की ऊँचाई अट्ठारह अङ्गुल एवं पीठ तक ऊँचाई चौदह अङ्गुल होनी चाहिये तथा व्यास बारह अङ्गुल होना चाहिये। पिछले ऊरुओं की चौड़ाई दश, आठ एवं चार अङ्गुल होनी चाहिये॥१२२-१२३॥ पञ्चाङ्गुलं तदायामं जानुदेशं द्विमात्रकम् । जङ्घादैर्घ्यं शराङ्गुल्या त्र्यङ्गुलं स्याद्विशालकम् ॥१२४॥ सुरोत्सेधं त्रिमात्रं स्यात् पुच्छमूलं तथैव च । सार्धाङ्गुलं तु पुच्छाग्रं जङ्घान्तं तस्य लम्बनम् ॥१२५॥ उनकी लम्बाई पाँच अङ्गुल एवं जानु (घुटना) दो अङ्गुल का होना चाहिये। जङ्घा (घुटने से नीचे का भाग) की लम्बाई पाँच अङ्गुल एवं चौड़ाई चार अङ्गुल होनी चाहिये। खुरों की ऊँचाई तीन अङ्गुल एवं इसी प्रकार पूँछ के मूल भाग का माप (तीन अङ्गुल) होना चाहिये। इसका अग्र भाग डेढ़ अङ्गुल होना चाहिये एवं जङ्घा के अन्त तक यह लटकती होनी चाहिये॥१२४-१२५॥ मुष्कायामविशालं तु त्रिद्विमात्रं यथाक्रमम् । शेफायामं त्रिमात्रं स्यादुदरादङ्गुलं घनम् ॥१२६॥ मुष्क (अण्डकोश) की लम्बाई तीन अङ्गुल एवं चौड़ाई दो अङ्गुल होनी चाहिये तथा शेफ (लिङ्ग) की लम्बाई तीन अङ्गुल एवं पेट के पास इसकी मोटाई एक अङ्गुल होनी चाहिये॥१२६॥ ऊरुमूलविशालं तु चतुरङ्गुलमग्रतः । जङ्घाग्रे तु द्विमात्रं स्याच्छेषं युक्तिवशान्नयेत् ॥१२७॥ ऊरुमूल की चौड़ाई चार अङ्गुल एवं आगे जङ्घा के अग्रभाग पर दो अङ्गुल प्रमाण का होना चाहिये। शेष को आवश्यकतानुसार निर्मित करना चाहिये। वृषभ की मूर्ति को खड़ी अथवा शयित (बैठी, फैली हुई) मुद्रा में, जो उचित लगे, निर्मित करनी चाहिये॥१२७॥ स्थितं वा शयितं वाऽपि यथायोग्यं तथाचरेत् । सुधालोहैः परैर्द्रव्यैर्यथा योग्यं तथा चरेत् ॥१२८॥

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