मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ मयमतम् घनं वाऽप्यघनं वाऽपि लोहजं युक्तितो नयेत्। सकलस्य तु यन्मानं तन्मानं वृषभोदयम् ॥१२९॥ यह प्रतिमा सुधा ( चूना, गारा ), लौह ( धातु ) या अन्य पदार्थों से, जो अनुकूल हों, निर्मित होनी चाहिये। प्रतिमा यदि धातुनिर्मित हो तो वह घन ( ठोस, पूर्ण रूप से भरी हुई ) या खोखली आवश्यकतानुसार हो सकती है। वृषभ की ऊँचाई शिव की मूर्ति की ऊँचाई के अनुसार हो सकती है॥१२८-१२९॥ किञ्चिन्न्यूनाधिकं कार्यं सर्वदोषसमुद्भवम्। तस्मात् परिहरेद्विद्वान् सर्वलक्षणसंयुक्तम् ॥१३०॥ द्वारलिङ्गसमं वृषभं वरं मध्यमं चतुरंशविहीनकम्। द्वित्रिभागसमोदयमीरितं कन्यसं त्रिविधं मुनिभिर्वरैः॥१३१॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे प्राकारपरिवारविधानो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः इसका कुछ कम या अधिक होना सभी प्रकार के दोषों को उत्पन्न करता है। अतः ज्ञाता शिल्पी को दोषों को त्यागते हुये सभी लक्षणों से युक्त वृषप्रतिमा का निर्माण करना चाहिये। श्रेष्ठ मुनियों के अनुसार वृषप्रतिमा की ऊँचाई तीन प्रकार की होनी चाहिये— १. शिव-लिङ्ग के द्वार के बराबर उत्तम प्रतिमा, २. उससे चार भाग कम मध्यम प्रतिमा तथा ३. तीन भाग में से दो भाग के बराबर कनिष्ठ प्रतिमा ( इस प्रकार वृष की तीन ऊँचाई वाले प्रमाण की प्रतिमायें होती हैं )॥१३०-१३१॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी १. प्राकार-निर्माण का उद्देश्य ( श्लोक १ ) इसका शिल्परत्न ( पूर्व. ४० ) में इस प्रकार वर्णन किया गया है— प्रासादसदनादीनां रक्षालङ्कारसिद्धये। वप्राणि क्रमशः कुर्यात्पञ्चद्वित्र्येकसंख्यया॥१॥ मानसार ( ३१.१) में प्राकार-निर्मिति का उद्देश्य इस प्रकार है— बल्यर्थं परिवारार्थं शोभार्थं रक्षणार्थकम्। प्राकार-प्रकल्पन का वर्णन ईशानशिवगुरुदेवपद्धति ( क्रिया.-३५ ), मानसार ( अ. ३१ ), शिल्परत्न ( पूर्व. अ. ४० ), तन्त्रसमुच्चय ( अ. २ ) आदि ग्रन्थों में प्राप्त होता है।