भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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त्रयोविंशोऽध्यायः 卐 प्राकारपरिवारविधानम् ३०३ २. पञ्च प्राकार (श्लोक ८-१०) (क) शिल्परत्न (पूर्व. ४४ अ.) में पञ्च प्राकारों का वर्णन इस प्रकार किया गया है— तत्रान्तर्मण्डलं त्वाद्यमन्तहारा द्वितीयकम्। तृतीयं मध्यहारा स्याद् बाह्यहारा चतुर्थकम्।।२।। मर्यादा पञ्चमं प्रोक्तं शालानां शिल्पवित्तमैः। दण्डेऽर्धेऽन्तर्गतं मण्डलमवनिमितेऽर्धान्विते वान्तहारा दोस्संख्ये मध्यहारा जलधिपरिमिते बाह्यहाराद्रिसंख्ये। मर्यादा मूलधाम्नः प्रथमचरमवर्जं मुखायामयुक्ताः प्राकाराः पञ्च कार्याः स्युरिह चरमसीमैकविंशेऽपि वा स्यात्।। (ख) तन्त्रसमुच्चय (२.७३) में पञ्च प्राकार के सन्दर्भ में वही श्लोक प्राप्त होता है, जो शिल्परत्न में वर्णित है। (ग) विष्णुसंहिता (१९.२४-२५) के अनुसार— अन्तर्मण्डलदण्डार्धदण्डे स्यादन्तहारका। मध्यहारा द्विदण्डा च चतुर्मर्यादभित्तिका।। सप्तदण्डायता कार्या मर्यादाभित्तिका ततः। ३. उपर्युक्त पञ्च प्राकार प्रसिद्ध हैं। मयमत में (श्लोक २-५) वर्णित महापीठ, मण्डूक, भद्रमहानस, सुप्रतीकान्त तथा इन्द्रकान्त साल एवं पीठ, स्थण्डिल, उभयचण्डित, सुसंहित एवं ईशकान्त साल का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. ४० अ.) में इस प्रकार वर्णित है— आद्यसालं महापीठं पदैः षोडशभिर्युतम्।।१२।। मण्डूकाख्यं द्वितीयं स्यान्मध्यहारा महानसम्। चतुर्थं सुप्रतीकान्तं पञ्चमं चेन्दुकान्तकम्।।१३।। एवं युग्मपदैर्युक्तमयुग्मैरथ कथ्यते। एवं मध्ये विमानं स्यादाद्यसालं तु पीठकम्।।१४।। द्वितीयं स्थण्डिलं सालं मध्यं चोभयचण्डितम्। चतुर्थं संहितं सालमीशकान्तं तु पञ्चमम्।।१५।। ४. परिवार-विधान (श्लोक ३६-३७) परिवार-विधान शिल्परत्न (पूर्व. ४२ अ.) में इस प्रकार वर्णित है—