भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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३०८ मयमतम् अष्टौ वा परिवाराः स्युर्द्वादशैव भवन्ति वा। अथ षोडश वा कार्यास्तथा द्वात्रिंशदेव वा।।१।। द्वात्रिंशत्परिवारास्तु जातिहर्म्ये विशेषतः। ५. परिवार-भेद अष्ट परिवार (श्लोक ३९-४०), द्वादश परिवार (श्लोक ४०-४१), षोडश परिवार (श्लोक ४२-४४), बत्तीस परिवार (श्लोक-४५-५७) का उल्लेख शिल्परत्न (पूर्व. अ.-४२.३-७) में प्राप्त होता है। ६. पीठलक्षण (श्लोक ७४-७५) पीठ का लक्षण शिल्परत्न (पूर्व. ४३ अ.) में इस प्रकार वर्णित है— गोपुराद् बाह्यतः कुर्याद् बलिपीठं सलक्षणम्। प्रासादार्धाद्बहिः कृत्वा षट्सप्तवसुदण्डकम्।।१।। गर्भार्धं वाथ विस्तारं गर्भगेहसमं तु वा।।९।। तत्पादोनं तु वा तारं बलिपीठेष्वथापि वा। एकहस्तं द्विहस्तं वा त्रिहस्तं वा समाचरेत्।।१०।। ७. प्राकाराश्रित स्थान (श्लोक ८३-८७) प्राकाराश्रित स्थानों का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. ४२ अ.) में इस प्रकार प्राप्त होता है— अग्निगोपुरयोर्मध्ये धनधान्यगृहं भवेत्।।४२।। याम्ये मज्जनशाला स्यात्तत्रस्थं पुष्पमण्डपम्। नैर्ऋतं स्थानमाश्रित्य कुर्यादायुधमण्डपम्।।४३।। वारुणे वायुदेशे वा शयनस्थानमीष्यते। सौम्ये देशे प्रकर्तव्यं धर्मश्रवणमण्डपम्।।४४।। ईशे वापिं च कूपं च कुर्यात्तत्रापवत्सके। ईशगोपुरयोर्मध्ये वाद्यस्थानं प्रकीर्तितम्।।४५।। आरादीशे विमानस्य कुर्यान्निर्माल्यधारिणम्। कूपं चारामकं चैव दीर्घिका च सुरालये।।४६।।