मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
३०८ मयमतम् अष्टौ वा परिवाराः स्युर्द्वादशैव भवन्ति वा। अथ षोडश वा कार्यास्तथा द्वात्रिंशदेव वा।।१।। द्वात्रिंशत्परिवारास्तु जातिहर्म्ये विशेषतः। ५. परिवार-भेद अष्ट परिवार (श्लोक ३९-४०), द्वादश परिवार (श्लोक ४०-४१), षोडश परिवार (श्लोक ४२-४४), बत्तीस परिवार (श्लोक-४५-५७) का उल्लेख शिल्परत्न (पूर्व. अ.-४२.३-७) में प्राप्त होता है। ६. पीठलक्षण (श्लोक ७४-७५) पीठ का लक्षण शिल्परत्न (पूर्व. ४३ अ.) में इस प्रकार वर्णित है— गोपुराद् बाह्यतः कुर्याद् बलिपीठं सलक्षणम्। प्रासादार्धाद्बहिः कृत्वा षट्सप्तवसुदण्डकम्।।१।। गर्भार्धं वाथ विस्तारं गर्भगेहसमं तु वा।।९।। तत्पादोनं तु वा तारं बलिपीठेष्वथापि वा। एकहस्तं द्विहस्तं वा त्रिहस्तं वा समाचरेत्।।१०।। ७. प्राकाराश्रित स्थान (श्लोक ८३-८७) प्राकाराश्रित स्थानों का वर्णन शिल्परत्न (पूर्व. ४२ अ.) में इस प्रकार प्राप्त होता है— अग्निगोपुरयोर्मध्ये धनधान्यगृहं भवेत्।।४२।। याम्ये मज्जनशाला स्यात्तत्रस्थं पुष्पमण्डपम्। नैर्ऋतं स्थानमाश्रित्य कुर्यादायुधमण्डपम्।।४३।। वारुणे वायुदेशे वा शयनस्थानमीष्यते। सौम्ये देशे प्रकर्तव्यं धर्मश्रवणमण्डपम्।।४४।। ईशे वापिं च कूपं च कुर्यात्तत्रापवत्सके। ईशगोपुरयोर्मध्ये वाद्यस्थानं प्रकीर्तितम्।।४५।। आरादीशे विमानस्य कुर्यान्निर्माल्यधारिणम्। कूपं चारामकं चैव दीर्घिका च सुरालये।।४६।।
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः ( गोपुरविधानम् ) अधुना गोपुराणां तु लक्षणं वक्ष्यते क्रमात् । क्षुद्रल्पमध्यमुख्यानां हर्म्याणां स्वप्रमाणतः ॥१॥ गोपुर—अब मैं ( मय ऋषि ) बहुत छोटे-छोटे, मध्यम एवं उत्तम आकार के प्रमुख भवनों के अनुसार गोपुरों के लक्षण का वर्णन करता हूँ ।।१।। ✺ पञ्चविधगोपुरमानम् ✺ मूलप्रासादविस्तारे सप्ताष्टनवभागिके । दशैकादशभागे तु तत्तदेकांशहीनकम् ॥२॥ द्वारशोभादिविस्तारं गोपुरान्तं यथाक्रमम् । क्षुद्रल्पयोः समुद्दिष्टं मध्यानां प्रविधीयते ॥३॥ पाँच प्रकार के गोपुरों का प्रमाण—द्वार-शोभा से प्रारम्भ करते हुये गोपुर तक द्वार का विस्तार इस क्रम से रखना चाहिये। प्रथम द्वार 'द्वारशोभा' का विस्तार प्रधान प्रासाद के विस्तार के सात भाग करने पर उससे एक भाग कम अर्थात् छठवें भाग के बराबर रखना चाहिये। ( दूसरे द्वार ) का विस्तार मूल प्रासाद के आठ भाग करने पर उससे एक भाग कम ( सात भाग ), ( तीसरे द्वार ) का विस्तार मूल भवन के विस्तार के नौ भाग करने पर उससे एक भाग कम ( आठ भाग ), ( चौथे द्वार ) का विस्तार मूल प्रासाद के दस भाग करने पर उससे एक भाग कम ( नौ भाग ) तथा ( पाँचवें द्वार—गोपुर ) का विस्तार मूल प्रासाद के ग्यारह भाग करने पर उससे एक भाग कम ( दस भाग ) रखना चाहिये। ये प्रमाण क्षुद्र एवं अल्प प्रासादों के गोपुरों के होते हैं। मध्यम प्रासादों के गोपुरों का मान इस प्रकार विहित है—।।२-३।। मूलधाम्नस्तु विस्तारे चतुष्पञ्चषडंशके । सप्ताष्टांशे च भागोनं गोपुरान्तं यथाक्रमम् ॥४॥ द्वारशोभादिविस्तारं पञ्चधा परिकीर्तितम् । ( मध्यम आकार के देवालयों में ) द्वारशोभा से गोपुर तक पाँच द्वारों के क्रमशः मान इस प्रकार हैं—मूल प्रासाद की चौड़ाई के चार भाग करने पर तीसरे भाग के मय०-२०
३०६ मयमतम् बराबर, पाँच भाग करने पर चौथे भाग के बराबर, छः भाग करने पर पाँचवें भाग के बराबर, सात भाग करने पर छठवें भाग के बराबर एवं आठ भाग करने पर सातवें भाग के बराबर विस्तार रखना चाहिये।।४।। त्रिभागैकांशमध्यं च द्विभागं स्यात्त्रिभागिके ॥५॥ चतुर्भागे त्रिभागं तु पञ्चांशे चतुरंशकम्। द्वारशोभादिविस्तारं गोपुरान्तं क्रमेण तु ॥६॥ उत्तमानामिदं प्रोक्तं हस्तैरप्यथ वक्ष्यते। द्वारशोभा से लेकर गोपुरपर्यन्त विस्तार उत्तम ( बड़े ) प्रासादों में विस्तारमान इस प्रकार क्रमशः रक्खा जाता है। ( प्रधान प्रासाद के विस्तार के ) तीन भाग में से एक भाग, डेढ़ भाग, दो भाग, चार भाग में तीन भाग या पाँच में से चार भाग के बराबर रखना चाहिये। अब विस्तार को हस्त-माप में वर्णित किया जा रहा है।।५-६।। द्विहस्तादि द्विरष्टान्तमेकारलिविवर्धनात् ॥७॥ एकैकं त्रिविधा मानं द्वारशोभादिपञ्चसु। त्रिहस्तादेकत्रिंशान्तं द्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥८॥ प्रोक्तं त्रिः पञ्चधा मानं द्वारशोभादिपञ्चके। नवहस्तं समारभ्य द्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥९॥ सप्तत्रिंशत्करं यावत् पञ्चपङ्क्तिप्रमाणकम्। शोभादिगोपुराणां च विस्तारं परिकीर्तितम् ॥१०॥ ( यदि प्रमुख देवालय छोटा हो तो ) द्वारशोभा आदि द्वारों का प्रमाण दो हाथ- माप से प्रारम्भ कर उसे एक-एक हाथ बढ़ाते हुये सोलह हाथ तक रखना चाहिये। ( मध्यम आकार के देवालय में ) द्वारशोभा आदि पाँच द्वारों में से एक-एक के तीन प्रकार के मान होते हैं। प्रथम द्वार द्वारशोभा से तीन हाथ मान से प्रारम्भ करते हुये दो-दो हाथ बढ़ाते हुये इकतीस हाथ तक ले जाना चाहिये। ( प्रमुख देवालय के उत्तम आकार के होने पर ) नौ हाथ से प्रारम्भ करते हुये सैंतीस हाथ तक दो-दो हाथ बढ़ाते हुये कुल पन्द्रह प्रकार के प्रमाण प्राप्त होते हैं। ये विस्तार-प्रमाण पाँचों द्वारों में द्वार- शोभा से प्रारम्भ होकर गोपुर-पर्यन्त रक्खे जाते हैं।।७-१०।। ☸ पञ्चविधगोपुरम् ☸ द्वारशोभा द्वारशाला द्वारप्रासादहर्म्यके। गोपुरेण तु पञ्चैते द्वारशोभादिपञ्चसु ॥११॥
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३०७ पाँच प्रकार के गोपुर—द्वारशोभा, द्वारशाला, द्वारप्रासाद, द्वारहर्म्य एवं गोपुर— ये पाँच द्वारों के क्रमशः नाम कहे गये हैं। प्रथम द्वार की संज्ञा 'द्वारशोभा' कही गई है।।११।। अथवा हस्तमानेन विस्तारं परिगृह्यताम्। त्रिपञ्चसप्तनन्दैकादशारत्नैर्विवर्धनात् ।।१२।। पञ्चमानं द्विरलिभ्यां पञ्चस्वेकस्य सम्मतम्। पञ्चसप्तत्रिरूप्येकादशत्रयोदशमानतः ।।१३।। प्रथमावरणे द्वारशोभाव्यासस्तु पञ्चधा। त्रिपञ्चाद्यात्रयोविंशद् द्वारशालाविशालता ।।१४।। पञ्चपञ्चकराद् यावत् त्रयस्त्रिंशत्करान्तकम्। द्वारप्रासादविस्तारं पञ्चधा परिकीर्तितम् ।।१५।। पञ्चत्रिंशत्कराद् यावत् त्रिचत्वारिंशदन्तकम्। द्वारहर्म्यस्य विस्तारं पञ्चभेदमथोच्यते ।।१६।। नवपञ्चकराद् यावत् त्रिपञ्चाशत्करान्तकम्। पञ्चधा विपुलं प्रोक्तं गोपुरस्य मुनीश्वरैः ।।१७।। इनके विस्तार का मान हस्तप्रमाण से ग्रहण करना चाहिये। इसके सम्भावित विस्तार-मान पाँच हैं। द्वार का विस्तार तीन, पाँच, सात, नौ या ग्यारह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाते हुये ( प्रथम द्वार से अन्तिम द्वार तक ) ले जाना चाहिये। इस प्रकार द्वारशोभा संज्ञक प्रथम द्वार का मान पाँच, सात, नौ, ग्यारह या तेरह हाथ होने पर 'द्वारशाला' संज्ञक द्वार का मान पन्द्रह से लेकर तेईस हाथ-पर्यन्त होता है। 'द्वार- प्रासाद' संज्ञक द्वार का मान पाँच प्रकार का होता है, जो पच्चीस हाथ से प्रारम्भ कर तैंतीस हाथ तक जाता है। 'द्वारहर्म्य' संज्ञक द्वार का मान पैंतीस हाथ से प्रारम्भ कर तैंतालीस हाथ-पर्यन्त पाँच प्रकार का होता है। अन्तिम 'गोपुर' संज्ञक द्वार का मान पैंतालीस हाथ से प्रारम्भ कर तिरेपन हाथ-पर्यन्त पाँच प्रकार का होता है।।१२-१७।। चक्रवर्तिमहाराजवेश्मन्येवमूह्यताम् । सार्धं त्रिपादं द्विगुणं त्र्यंशैकद्व्यंशमायतम् ।।१८।। शोभादीनां तु पञ्चानां द्वाराणामुदितं ततः। तेषामेवं क्रमाद् व्यासादुत्सेधं पृथगुच्यते ।।१९।। उक्त प्रकार से ही चक्रवर्ती एवं महाराज राजाओं के भवनों में भी द्वार का निर्माण
३०८ मयमतम् करना चाहिये। द्वारशोभा आदि पाँच द्वारों की चौड़ाई उनके लम्बाई की डेढ़ गुनी, पौने दो गुनी, दुगुनी अथवा पौने तीन गुनी निर्धारित करनी चाहिये। चौड़ाई के क्रम से ही अब उनकी ऊँचाई का वर्णन किया जा रहा है।।१८-१९।। सप्तांशे च दशांशं च चतुरंशे षडंशकम् । सप्तभागं चतुर्भागे त्रित्रिभागं तु पञ्चके ।।२०।। द्विगुणं तु यथासंख्यं द्वारायतनतुङ्गता । गोपुरस्य तु विस्तारत्रिभागादेकभागिकम् ।।२१।। चतुर्भागैकभागं च पञ्चभागद्विभागिकम् । निर्गमं गोपुराणां तु प्राकाराद्भित्तिबाह्यतः ।।२२।। द्वारों की चौड़ाई के सात भाग में दशवाँ भाग, चार भाग में छठा भाग, चार भाग में सातवाँ भाग तथा पाँच भाग में नवाँ भाग एवं दुगुना मान ऊँचाई के लिये क्रमशः ग्रहण करना चाहिये। गोपुर के द्वारायतन (द्वार पर निर्मित भवन) की ऊँचाई के ये मान कहे गये हैं। प्राकारभित्ति की चौड़ाई का तीसरा भाग, एक चौथाई अथवा पाँच भाग में से दो भाग के बराबर गोपुरों का निर्गम (बाहर की ओर निकला हुआ निर्माण- विशेष) निर्मित करना चाहिये ।।२०-२२।। ❋ द्वारमानम् ❋ मूलं सार्धं तु पादोनद्विहस्तं तु द्विहस्तकम् । तत्तत्षडङ्गुलैर्नन्दमात्रैर्द्वादशमात्रकैः ।।२३।। वृद्ध्या पञ्चकरान्तं तु सप्तान्तं तु नवान्तकम् । द्वारं त्रिःपञ्चधामानमेकैकं तु पृथक् पृथक् ।।२४।। क्षुद्रे मध्ये वरे द्वारविस्ताराः परिकीर्तिताः । तत्तद्वैपुल्यवशतस्तत्तदुत्सेधमुच्यते ।।२५।। द्वार-प्रमाण— क्षुद्र (छोटे), मध्यम एवं श्रेष्ठ (बड़े) द्वारों का विस्तार-प्रमाण इस प्रकार होता है। क्षुद्र द्वार की चौड़ाई डेढ़ से प्रारम्भ कर पाँच हाथ तक छः-छः अंगुल बढ़ाते हुये ले जाना चाहिये। मध्यम द्वार की चौड़ाई दो हाथ से प्रारम्भ करते हुये सात हाथ तक नौ-नौ अंगुल बढ़ाते हुये ले जाना चाहिये। बड़े द्वार की चौड़ाई दो हाथ से प्रारम्भ करते हुये नौ हाथ तक बारह अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुये ले जाना चाहिये। इस प्रकार प्रत्येक द्वार के पन्द्रह प्रमाण पृथक्-पृथक् प्राप्त होते हैं। विस्तार के अनुसार उनकी ऊँचाई अग्र वर्णित प्रकार से प्राप्त होती है।।२३-२५।। पञ्चांशेभ्यश्च सप्तांशं सप्तांशेभ्यो दशांशकम् । द्विगुणार्धाधिकं पादाधिकं पञ्चोच्छ्रयाः स्मृताः ।।२६।।
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३०९ उनकी ऊँचाई क्रमशः उनकी चौड़ाई के पाँच भाग से सात भाग, सात भाग से दस भाग, दुगुनी, ढाई गुनी एवं सवा दोगुनी होनी चाहिये। ये पाँच ऊँचाई के प्रमाण कहे गये हैं।।२६।। अधिष्ठानादिमानम् मूलवस्तु निरीक्ष्यैव पादाधिष्ठानतुङ्गता। चतुष्पञ्चर्तुसप्ताष्टनन्दपङ्क्तीशभानुषु ॥२७॥ भागेष्वेकैकभागोनं स्वाधिष्ठानान्ततुङ्गकम्। शेषं तदुपपीठं स्यात् पादबन्धं मसूरकम् ॥२८॥ अधिष्ठान आदि के प्रमाण—प्रधान भवन को देखकर ही गोपुर के पाद ( स्तम्भ ) एवं अधिष्ठान की ऊँचाई रखनी चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई प्रधान भवन के चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह एवं बारह भागों से एक-एक भाग कम रखना चाहिये। शेष भाग से उपपीठ का निर्माण करना चाहिये। यह पादबन्ध मसूरक ( अधिष्ठान ) होता है।।२७-२८।। प्रासादस्तम्भमानं वा वसुभागोनमेव वा। नन्दपङ्क्त्यंशहीनं वा गोपुरस्तम्भतुङ्गकम्॥२९॥ छेदयेत्तदधिष्ठानं होमान्तं खातपादकम्। उत्तरान्तं समुत्सेधं तदर्धं द्वारविस्तृतम् ॥३०॥ प्रवेशदक्षिणे गर्भमारूढे भित्तिके भवेत्। प्रासाद के स्तम्भ का प्रमाण भी इसी प्रकार रखना चाहिये। अथवा गोपुर-स्तम्भ की ऊँचाई आठ, नौ या दस भाग में एक-एक भाग कम रखनी चाहिये। ( स्तम्भ के लिये ) अधिष्ठान में होमान्त तक खातपादक ( स्तम्भ के लिये गड्ढा ) निर्मित करना चाहिये। इसकी ( द्वार की ) ऊँचाई उत्तर ( भित्ति का भागविशेष ) तक रखनी चाहिये एवं द्वार का विस्तार इसका आधा होना चाहिये। प्रवेश के दक्षिण में भित्ति के नीचे गर्भन्यास ( शिलान्यास ) करना चाहिये।।२९-३०।। ✺ गोपुरभेदाः ✺ श्रीकरं रतिकान्तं च कान्तविजयमेव च॥३१॥ विजयविशालकं चैव विशालालयमेव च। विप्रतीकान्तं श्रीकान्तं श्रीकेशं च तथा पुनः॥३२॥ केशविशालकं स्वस्तिकं दिशास्वस्तिकमेव च। मर्दलं मात्रकाण्डं च श्रीविशालं चतुर्मुखम्॥३३॥
३१० मयमतम् एते पञ्चदश प्रोक्ता गोपुरस्याभिधानकाः । गोपुर के प्रकार—पन्द्रह प्रकार के गोपुरों के नाम इस प्रकार हैं—श्रीकर, रति- कान्त, कान्तविजय, विजयविशालक, विशालालय, विप्रतीकान्त, श्रीकान्त, श्रीकेश, केशविशालक, स्वस्तिक, दिशास्वस्तिक, मर्दल, मात्रकाण्ड, श्रीविशाल एवं चतुर्मुख ।। ३१-३३।। एकादिपञ्चभूम्यन्तं शोभाद्यल्पप्रमाणकम् ।। ३४।। द्वितलादि षट्तलान्तं मध्यमक्रममुच्यते । त्रितलात् सप्ततलपर्यन्तं चोत्तममुच्यते ।। ३५ ।। सोपपीठमधिष्ठानं पादोच्चमुत्तरान्तकम् । शेषं तत्स्थूपिपर्यन्तं भागमानं विधीयते ।। ३६ ।। छोटे मन्दिरों में पाँच गोपुर द्वारशोभा से प्रारम्भ कर एक से पाँच तल तक क्रमशः होना चाहिये। मध्यम मन्दिरों में दो से छः तल तक एवं बड़े मन्दिरों में तीन से सात तल तक होने चाहिये ।। ३४-३५ ।। ✸ एकतलगोपुरम् ✸ स्थूप्यन्तमुत्तरान्तं च षड्भागं विभजेत्समम् । सपादभागमञ्चोच्चं कन्थरोच्चं तदंशकम् । सत्रिपादद्विभागं तु शिरःशेषं शिखोदयम् ।। ३७।। एवमेकतलं प्रोक्तं द्वितले भागमुच्यते । एक तल का गोपुर—एक तल के गोपुर की ऊँचाई उत्तरान्त से स्थूपी ( स्तूपिका ) तक छः बराबर भागों में बाँटनी चाहिये। सवा भाग मञ्च की ऊँचाई, एक भाग कन्धर, तीन चौथाई सहित दो भाग से शिरोभाग एवं शेष से शिखोदय का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार एक तल गोपुर का वर्णन किया गया। अब दो तल गोपुर के भागों का वर्णन किया जा रहा है।। ३६-३७।। ✸ द्वितलगोपुरम् ✸ उत्तरादिशिखान्तं यन्नवधा विभजेत् समम् ।। ३८।। सपादभागमञ्चोच्चं द्व्यंशार्धं चरणायतम् । भागैकं प्रस्तरोत्सेधमेकांशं कन्थरोदयम् ।। ३९ ।। सार्धद्व्यंशं शिरस्तुङ्गं शेषभागशिखोदयम् । एवं द्वितलमाख्यातं त्रितले भागमुच्यते ।। ४० ।।
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३११ दो तल का गोपुर—( द्वितल गोपुर में प्रथम तल के ) उत्तर से प्रारम्भ करते हुए शिखा ( शिरोभाग ) तक नौ बराबर भागों में बाँटना चाहिये। ( प्रथम तल के ) मञ्च की ऊँचाई सवा भाग, ढाई भाग चरण ( अर्थात् द्वितीय तल का भाग ), एक भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, एक भाग कन्धर, ढाई भाग शिरोभाग की ऊँचाई एवं शेष भाग से शिखा ( शीर्षभाग ) का उदय निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार द्वितल का वर्णन किया गया। अब त्रितल गोपुर के भागों का वर्णन किया जा रहा है।।३८-४०।। ✺ त्रितलगोपुरम् ✺ स्तूप्यन्तमुत्तरान्तं च कृत्वोच्चं द्वादशांशकम् । सपादांशं कपोतोच्चं द्व्यंशार्धं चरणायतम् ॥४१॥ भागैकं प्रस्तरोत्सेधं द्विभागं पाददैर्घ्यकम् । त्रिपादं तत्कपोतोच्चमंशं ग्रीवोदयं भवेत् ॥४२॥ सार्धद्व्यंशं शिरस्तस्माच्छेषं स्तूप्युच्छ्रयं भवेत् । एवं त्रितलमाख्यातं चतुर्भौममथोच्यते ॥४३॥ तीन तल का गोपुर—( त्रितल गोपुर में ) स्तूपी से लेकर उत्तरपर्यन्त ऊँचाई को बारह बराबर भागों में बाँटना चाहिये। डेढ़ भाग से कपोत की ऊँचाई, ढाई भाग से चरण ( द्वितीय तल की ऊँचाई ), एक भाग से प्रस्तर, दो भाग से पाद ( तृतीय तल की ऊँचाई ), पौने एक भाग से कपोत, एक भाग से ग्रीवा, ढाई भाग से शिर एवं शेष भाग से स्तूपी ( स्तूपिका ) की ऊँचाई रखनी चाहिये। इस प्रकार त्रितल गोपुर का वर्णन किया गया। अब चतुस्तल गोपुर का वर्णन किया जा रहा है।।४१-४३।। ✺ चतुस्तलगोपुरम् ✺ उत्तरादिशिखान्तं यन्मानमष्टादशांशकम् । सत्रिपादांशकं मञ्चं त्रिभागं तलिपायतम् ॥४४॥ सार्धांशं प्रस्तरोच्चं स्याद् द्व्यंशं सार्धं पदोदयम् । सपादभागं मञ्चोच्चं द्व्यंशं स्यात् स्तम्भदैर्घ्यकम् ॥४५॥ मञ्चमंशं गलं भागं त्रिभागं शिखरोदयम् । शेषभागं शिखामानं पञ्चभौममथोच्यते । चार तल का गोपुर—( चार तल के गोपुर में ) उत्तर से शिखा तक के प्रमाण को अट्ठारह भागों में बाँटा जाता है। पौने दो भाग से मञ्च, तीन भाग से तलिप ( द्वितीय तल ), डेढ़ भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, ढाई भाग से पद ( तृतीय तल ), सवा एक भाग से मञ्च की ऊँचाई, दो भाग से स्तम्भ की ऊँचाई ( चतुर्थ तल ), एक भाग से
३१२ मयमतम् मञ्च, एक भाग से गल, तीन भाग से शिखर एवं शेष भाग से शिखा का प्रमाण रखना चाहिये। अब पाँच तल के गोपुर का वर्णन किया जा रहा है।।४४-४५।। ✺ पञ्चतलगोपुरम् ✺ स्तूप्यन्तमुत्तरान्तं च त्रयोविंशतिभागिकम् ।।४६।। द्विभागं प्रस्तरोच्चं स्यात्त्र्यंशार्धं चरणायतम्। पादोन द्वयंशकं मञ्चं पादायामं त्रियंशकम् ।।४७।। सार्धांशमूर्ध्वमञ्चोच्चं द्वयंशार्धं पाददैर्घ्यकम्। सपादांशं कपोतोच्चं द्वयंशं स्यात्तलिपायतम् ।।४८।। प्रस्तरोच्चं तु भागेन कन्धरं भागमिष्यते। द्वयंशार्धं शिखरोत्सेधं शेषं स्तूप्युच्छ्रयं भवेत् ।।४९।। पाँच तल का गोपुर—( पाँच तल के गोपुर के मान को ) स्तूपी से उत्तर पर्यन्तप्रमाण को तेईस भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, साढ़े तीन भाग से चरण ( दूसरा तल ), पौने दो भाग से मञ्च, तीन भाग से पाद ( तीसरा तल ), डेढ़ भाग से मञ्च, ढाई भाग से पाद ( चतुर्थ तल ), सवा एक भाग से कपोत, दो भाग से तलिप ( पाँचवाँ तल ), एक भाग से प्रस्तर, एक भाग से कन्धर, ढाई भाग से शिखर एवं शेष भाग से स्तूपी की ऊँचाई रखनी चाहिये ।।४६-४९।। ✺ षट्तलगोपुरम् ✺ उत्तरादिशिखान्तं स्यादेकोनत्रिंशदंशकम्। द्विभागं प्रस्तरोत्सेधं पादोच्चं चतुरंशकैः ।।५०।। पादोनद्वयंशकं मञ्चं त्र्यंशार्धं पाददैर्घ्यकम्। सत्रिपादांशकं मञ्चं त्रिभागं तलिपायतम् ।।५१।। सार्धांशं प्रस्तरोत्सेधं द्वयंशार्धं पाददैर्घ्यकम्। सपादांशं कपोतोच्चमूर्ध्वभागं द्विभागतः ।।५२।। प्रस्तरोच्चं तु भागेन कन्धरं तत्समं भवेत्। सार्धद्वयंशं शिरस्तस्माच्छेषभागं शिखोदयम् ।।५३।। एवं तु षट्तलं प्रोक्तं सप्तभौममथोच्यते। छः तल का गोपुर—( छः तल के गोपुर में ) उत्तर से शिखापर्यन्त प्रमाण को उन्तीस भागों में बाँटना चाहिये। दो भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, चार भाग से पाद ( द्वितीय तल ), पौने दो भाग से मञ्च, साढ़े तीन भाग से पाद ( तीसरा तल ), पौने
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१३ दो भाग से मञ्च, तीन भाग से तलिप ( चतुर्थ तल ), डेढ़ भाग से प्रस्तर, ढाई भाग से पाद ( पाँचवाँ तल ), सवा एक भाग से कपोत, दो भाग से ऊर्ध्व भाग ( ऊपरी तल, छठवाँ तल ), एक भाग से प्रस्तर, एक भाग से कन्धर, ढाई भाग से शिरोभाग एवं शेष भाग से शिखाभाग की ऊँचाई रखनी चाहिये। इस प्रकार छः तल गोपुर का वर्णन किया गया। अब सात तल के गोपुर का वर्णन किया जा रहा है।।५०-५३।। ⁕ सप्ततलगोपुरम् ⁕ उत्तरादिशिखान्तं यन्मानं षट्त्रिंशदंशकम् ॥५४॥ मञ्चं साङ्घ्रिद्वयं सार्धवेदांशं पाददैर्घ्यकम् । द्विभागं प्रस्तरोत्सेधं पादोच्चं चतुरंशकम् ॥५५॥ सत्रिपादांशकं मञ्चं त्र्यंशार्धं चरणायतम् । पादोनद्व्यंशमञ्चोच्चं त्रिभागं पाददैर्घ्यकम् ॥५६॥ सार्धांशं प्रस्तरोच्चं तु द्व्यंशार्धं तलिपायतम् । सपादभागमञ्चोच्चमूर्ध्वपादं द्विभागिकम् ॥५७॥ कपोतोच्चं तु भागेन तत्समं कन्धरोदयम् । सत्रिपादाश्विनीभागं शिरःशेषं शिखोदयम् ॥५८॥ एवं भागानि कर्तव्यान्युर्वीसंख्याक्रमेण तु । सात तल का गोपुर—( सात तल के गोपुर के ) उत्तर से प्रारम्भ कर शिखा- पर्यन्त प्रमाण को छत्तीस भागों में बाँटना चाहिये। सवा दो भाग से मञ्च, साढ़े चार भाग से पाद ( द्वितीय तल ), दो भाग से प्रस्तर, चार भाग से पाद ( तृतीय तल ), पौने दो भाग से मञ्च, साढ़े तीन भाग से चरण ( चतुर्थ तल ), पौने दो भाग से मञ्च, तीन भाग से पाद ( पाँचवाँ तल ), डेढ़ भाग से प्रस्तर, ढाई भाग से तलिप ( छठवाँ तल ), सवा एक भाग से मञ्च, दो भाग से ऊर्ध्व पाद ( सातवाँ तल, ऊपरी तल ), एक भाग से कपोत, एक भाग से कन्धर, पौने तीन भाग से शिरोभाग एवं शेष भाग से शिखा की ऊँचाई रखनी चाहिये। इस प्रकार इस क्रम से गोपुरों का भाग निर्धारित करना चाहिये।।५४-५८।। ⁕ गोपुरविस्तारमानम् ⁕ विस्तारे पञ्चभागे तु नालीगेहं त्र्यंशकम् ॥५९॥ शेषं तु भित्तिविष्कम्भमेकभूमेर्विधीयते । गोपुर के विस्तार का प्रमाण—एक तल वाले गोपुर की चौड़ाई के पाँच भाग
३१४ मयमतम् करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह ( मध्य का स्थान ) एवं शेष भाग से भित्तिविष्कम्भ ( भित्ति की मोटाई ) निर्मित करनी चाहिये।।५९।। विस्तारे सप्तभागं स्याद्गर्भगेहं युगांशकम् ।।६०।। शेषं तु भित्तिविष्कम्भमेकांशं कूटविस्तृतम्। कोष्ठकं त्र्यंशकं तारे पञ्चांशं स्यात्तदायते ।।६१।। कूटकोष्ठकयोर्मध्ये पञ्जरादिविभूषितम्। एवं द्वितलमुद्दिष्टं त्रितलस्य विधीयते ।।६२।। ( यदि दो तलों का गोपुर हो तो ) चौड़ाई के सात भाग करने चाहिये। चार भाग से गर्भगृह ( मध्य भाग ) एवं शेष भाग से भित्तिविष्कम्भ ( भित्ति की चौड़ाई ) रखनी चाहिये। एक भाग से कूट का विस्तार रखना चाहिये। कोष्ठक का विस्तार तीन भाग से एवं लम्बाई पाँच भाग से निर्मित करनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ के मध्य भाग को पञ्जर आदि से अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार द्वितल गोपुर का वर्णन किया गया है। अब त्रितल गोपुर का वर्णन किया जा रहा है।।६०-६२।। विस्तारे नवभागे तु नालीगेहं त्र्यंशकम्। गृहपिण्ड्यलिन्द्रहारा भागेन परिकल्पयेत् ।।६३।। कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत्। शेषं तु भित्तिविष्कम्भमेकांशं कूटविस्तृतम् ।।६४।। ( त्रितल गोपुर में ) चौड़ाई के नौ भाग करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह ( मध्य भाग ), एक भाग से गृहपिण्डी ( अन्तःभित्ति ) एवं एक भाग से अलिन्दहारा ( बाह्य भित्ति ) निर्मित करनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पहले के समान निर्मित करना चाहिये। शेष भाग से भित्ति-विष्कम्भ एवं एक भाग से कूट का विस्तार रखना चाहिये।।६३-६४।। शालायामं त्रिभागं स्यादेकांशं लम्बपञ्जरम्। हाराभागमथार्धं स्यादायामे कोष्ठकायतुम् ।।६५।। पञ्चांशं वा षडंशं वाप्यूर्ध्वे सप्तांशविस्तृतम्। शाला ( मध्य कोष्ठ ) की लम्बाई तीन भाग एवं लम्ब-पञ्जर ( मध्य में लटकता हुआ कोष्ठ ) एक भाग, आधे भाग से हाराभाग निर्मित होना चाहिये। कोष्ठ की लम्बाई पाँच या छः भाग होनी चाहिये एवं ऊर्ध्व भाग में चौड़ाई सात भाग होनी चाहिये।।६५।। कूटमंशं द्विभागेन शालायामं द्विभागिकम् ।।६६।।
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१५ हारायां क्षुद्रनीडं तदर्धभागमिति स्मृतम्। शालायामं तु पञ्चांशमायामे प्रविधीयते ॥६७॥ एवं त्रितलमाख्यातं शेषमूह्यं विचक्षणैः । कूट की चौड़ाई एक भाग से, शाला (मध्य कोष्ठ) की चौड़ाई एवं लम्बाई दोनों दो भाग से, हारा (मध्य निर्मिति) दो भाग से एवं क्षुद्रनीड (छोटी सजावटी खिड़कियाँ) आधे भाग से निर्मित करनी चाहिये। शाला की लम्बाई को पाँच भाग से निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार त्रितल गोपुर का वर्णन किया गया है। शेष भागों का निर्माण विद्वान् लोगों को अपने विचार के अनुसार करना चाहिये।।६६-६७।। तारे पङ्क्त्यंशके नालीगेहं तत्त्रिभिरंशकैः ॥६८॥ सार्धांशं भित्तिविष्कम्भमेकभागमलिन्द्रकम् । एकांशं खण्डहर्म्यं स्यात्कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥६९॥ मुखेऽमुखे महाशाला पञ्चांशं च षडंशकम् । सर्वावयवसंयुक्तं चतुर्भौममिदं वरम् ॥७०॥ (चार तलों वाले गोपुर में) चौड़ाई के दस भाग करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह (मध्य भाग), डेढ़ भाग से भित्ति-विष्कम्भ (भीतरी भित्ति की मोटाई) एक भाग से अलिन्द एवं एक भाग से खण्डहर्म्य (बाह्य भित्ति से सम्बद्ध संरचना) निर्मित करनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ का निर्माण पहले के समान करना चाहिये। सामने एवं पीछे के भाग में महाशाला (बड़ा प्रकोष्ठ) पाँच भाग एवं छः भाग से निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार सभी अंगों से युक्त चार तल से युक्त श्रेष्ठ गोपुर निर्मित होता है।।६८-७०।। तारे रुद्रांशके नालीगेहं तत्त्रिभिरंशकैः । द्विभागं भित्तिविष्कम्भमेकभागमलिन्द्रकम् ॥७१॥ एकांशं खण्डहर्म्यं स्याच्छेषं पूर्ववदाचरेत् । एवं पञ्चतलं विद्यात् षट्तलं चाधुनोच्यते ॥७२॥ (पञ्चतल गोपुर में) विस्तार के ग्यारह भाग करने चाहिये। तीन भाग से नालीगेह, दो भाग से भित्ति-विष्कम्भ, एक भाग से अलिन्द्र, एक भाग से खण्डहर्म्य एवं अन्य अंगों का निर्माण पूर्व-वर्णित विधि से करना चाहिये। इस प्रकार पञ्चतल गोपुर का निर्माण करना चाहिये। अब षट्तल गोपुर का वर्णन किया जा रहा है। विपुले द्वादशांशे तु नालीगेहं युगांशकम् । द्विभागं भित्तिविष्कम्भमंशेनान्धारकं भवेत् ॥७३॥
३१६ मयमतम् अंशेन खण्डहर्म्यं स्यात्कूटकोष्ठादि पूर्ववत्। (षट्तल में) चौड़ाई के बारह भाग करने चाहिये। चार भाग से नालीगेह, दो भाग से भित्ति-विष्कम्भ, एक भाग से अन्धारक (मार्गविशेष) एवं एक भाग से खण्डहर्म्य निर्मित करना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि की संरचना पहले के समान करनी चाहिये।।७३।। तारे त्रयोदशांशे तु गर्भगेहं युगांशकम् ॥७४॥ द्वयंशार्धं भित्तिविष्कम्भमेकभागमलिन्द्रकम् । एकांशं खण्डहर्म्यं स्यात्कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥७५॥ मुखेऽमुखे महाशाला षड्भागेन विधीयते। पञ्जरैर्हस्तिपृष्ठैश्च पक्षशालादिभिर्युतम् ॥७६॥ नानामसूरकस्तम्भवेदीजालकतोरणम् । एवं सप्ततलं प्रोक्तं गोपुरं सार्वदेशिकम् ॥७७॥ (सात तल के गोपुर में) चौड़ाई के तेरह भाग करने चाहिये। चार भाग से गर्भगृह (नालीगृह, मध्यभाग), ढाई भाग से भित्ति-विष्कम्भ, एक भाग से अलिन्द्र एवं एक भाग से खण्डहर्म्य का निर्माण करना चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि पूर्वविधि से निर्मित करनी चाहिये। सामने एवं पृष्ठभाग में छः भाग से महाशाला निर्मित करना चाहिये। इसे पञ्जर, हस्तिपृष्ठ, पक्षशाला आदि से युक्त करना चाहिये। इसमें विभिन्न प्रकार के मसूरक (अधिष्ठान), स्तम्भ, वेदी एवं जालक-तोरण निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार सभी स्थानों के अनुकूल सप्ततल गोपुर का वर्णन किया गया।।७४-७७।। ✵ द्वारविस्तारमानम् ✵ मूलद्वारस्य विस्तारे पञ्चभागैकहीनकम् । चतुर्भागैकहीनं वोपरिष्टाद् द्वारविस्तृतम् ॥७८॥ उपर्युपरि वेशं च मध्यपादोत्तरैर्युतम् । गर्भगारे तु सोपानं ह्युपर्युपरि विन्यसेत् ॥७९॥ द्वार की चौड़ाई का प्रमाण—ऊपरी तल के द्वार की चौड़ाई मूल द्वार (निचले तल, भूतल के द्वार) के विस्तार से पाँच या चार भाग कम होना चाहिये। प्रत्येक तल के मध्य भाग में पाद एवं उत्तर (चौखट) से युक्त द्वार स्थापित होना चाहिये। ऊपरी तलों में सोपान का विन्यास गर्भ-गृह (मध्य भाग) में करना चाहिये। चतुष्कर्णे तु सोपानमुपपीठे प्रशस्यते । यथायुक्ति यथाशोभं तथा योज्यं विचक्षणैः ॥८०॥
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१७ सोपान चौकोर उपपीठ से प्रारम्भ करना प्रशस्त होता है। बुद्धिमान (स्थपति) को जिस प्रकार सोपान का निर्माण सुन्दर लगे, उस प्रकार समुचित रीति से करना चाहिये।।८०।। ✺ गोपुरालङ्कारः ✺ गोपुराणामलङ्कारं प्रत्येकं वक्ष्यतेऽधुना । मण्डपाभा यथा द्वारशोभा तत्र प्रकीर्तिता ॥८१॥ दण्डशाला यथा द्वारशाला तत्र विधीयते । प्रासादाकृतिवद् द्वारप्रासादं प्रोच्यते बुधैः ॥८२॥ मालिकाकृतिवद् द्वारहर्म्यं तु प्रोच्यते बुधैः । सशालाकृतिसंस्थानं द्वारगोपुरमिष्यते ॥८३॥ सर्वेषु गोपुरं कुर्याद्यथायुक्ति विशेषतः । गोपुर के अलङ्कार—गोपुरों के प्रत्येक अलङ्कार का वर्णन अब किया जा रहा है। द्वारशोभा गोपुर का निर्माण मण्डप के सदृश करना चाहिये। द्वारशाला गोपुर का निर्माण दण्डशाला के समान करना चाहिये। द्वारप्रासाद गोपुर का निर्माण प्रासाद (मन्दिर) की आकृति के सदृश करना चाहिये। द्वारहर्म्य गोपुर की आकृति मालिका की आकृति के समान होनी चाहिये। द्वारगोपुरसंज्ञक गोपुर का स्वरूप शाला के समान होना चाहिये। सभी गोपुरों का अलङ्करण विशेष रूप से यथोचित रीति से करना चाहिये।।८१-८३।। ✺ श्रीकर-द्वारशोभा ✺ श्रीकरस्याप्यलङ्कारं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥८४॥ विस्तारद्विगुणं वाऽपि पादोनद्विगुणायतम् । पञ्चसप्तनवांशं तु विस्तारे प्रविधीयते ॥८५॥ विस्तारांशप्रमाणेन दैर्घ्यभागांश्च कल्पयेत् । एकद्वित्रितलोपेतं सर्वावयवसंयुतम् ॥८६॥ श्रीकर-रीति से द्वारशोभा—श्रीकर के भी अलङ्कारों का वर्णन क्रमानुसार किया जा रहा है। इसकी लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी या दुगुनी से चौथाई कम होनी चाहिये। विस्तार के पाँच, सात या नौ भाग करने चाहिये। विस्तार के भाग-प्रमाण से लम्बाई के भाग निश्चित करना चाहिये। इसे एक, दो या तीन तल से एवं सभी अंगों से युक्त निर्मित करना चाहिये।।८४-८६।।
३१८ मयमतम् स्वस्तिकाकृतिकं नासो सर्वत्र प्रविधीयते । मुखेऽमुखे महानासी वंशनासी द्विपाश्र्वयोः ॥८७॥ शिरःक्रकरकोष्ठं वा युग्मस्थूपिसमायुतम् । लुपारोहिशिरो वाऽपि मण्डपाकृतिरेव वा ॥८८॥ स्वस्तिक के आकृति की नासा ( सजावटी छोटी खिड़की ) सभी स्थानों पर होनी चाहिये। सामने एवं पीछे महानासी तथा दोनों पार्श्वों में वंशनासी का निर्माण करना चाहिये। शिरोभाग में क्रकर कोष्ठ ( विशिष्ट आकृति ) या सम संख्या में स्थूपी होनी चाहिये। साथ ही इसके शिरोभाग पर लुपा हो अथवा इसकी आकृति मण्डप के सदृश होनी चाहिये॥८७-८८॥ ✺ रतिकान्त-द्वारशोभा ✺ रतिकान्तस्य संस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम् । कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् ॥८९॥ शालाकारशिरस्तस्मिन् षण्णासी मुखपृष्ठयोः । सार्धकोटिसमायुक्तं मध्यवेशनसंयुतम् ॥९०॥ रतिकान्त रीति से द्वारशोभा—रतिकान्त शैली में लम्बाई चौड़ाई से डेढ़ गुनी अधिक होती है। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला के आकार का होना चाहिये एवं षण्णासी ( छोटी- छोटी छः सजावटी खिड़कियाँ ) सामने एवं पीछे होनी चाहिये तथा अर्धकोटि ( विशिष्ट आकृति ) का निर्माण करना चाहिये। स्थूपियों की संख्या सम होनी चाहिये। इसे अन्तःपाद ( भीतरी स्तम्भ ) एवं उत्तर से युक्त तथा मध्यवेशन ( मध्य भाग में कक्ष ) से युक्त निर्मित करना चाहिये॥८९-९०॥ ✺ कान्तविजय-द्वारशोभा ✺ कान्तविजयसंस्थानं तारत्रिद्व्यंशमायतम् ॥९१॥ पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठादि पूर्ववत् । अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं नानाङ्गैः समलंकृतम् ॥९२॥ शिखरे च मुखे पृष्ठे षण्णास्यः पार्श्वयोर्द्वयोः । सभाकारः शिरस्तस्मिन्नयुग्मस्थूपिकान्वितम् ॥९३॥ द्वारशोभात्रयं प्रोक्तं द्वाराङ्गं मुखशोभितम् । कान्तविजय रीति से द्वारशोभा—कान्तविजय द्वारशोभा की लम्बाई उसकी
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३१९ चौड़ाई से दो तिहाई अधिक होती है। इसके तल पूर्व वर्णित एवं कूट तथा कोष्ठ आदि अंग भी पूर्ववर्णित विधि से निर्मित करने चाहिये। इसे भीतरी स्तम्भों एवं उत्तर से युक्त तथा विविध अंगों से सुसज्जित करना चाहिये। शिखर के आगे एवं पीछे षण्णासी (छः नासियाँ) तथा दोनों पार्श्वों में सभा के आकार का शिरोभाग होना चाहिये, जिस पर विषम संख्या में स्थूपिकायें होनी चाहिये। इस प्रकार द्वारशोभा के तीन भेदों का वर्णन किया गया, जो अपने सभी अंगों से युक्त हैं एवं जिनका मुखभाग अलंकृत है।।९१-९३।। ✵ विजयविशाल-द्वारशाला ✵ विजयविशालसंस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥९४॥ सपादं वाऽथ सार्धं वा पादोनद्विगुणायतम् । सप्तनन्दशिवांशैश्च तलं द्वित्रिचतुष्टयम् ॥९५॥ द्वारशालासंज्ञक गोपुर का विजयविशाल प्रकार—विजयविशाल द्वारशाला की लम्बाई उसकी चौड़ाई की
३२० मयमतम् विशालालय प्रकार की द्वारशाला—विशालालय द्वारशाला की लम्बाई उसकी चौड़ाई से चतुर्थांश कम दुगुनी रखनी चाहिये। इसके तल पूर्ववर्णित विधि से निर्मित होने चाहिये तथा इसे कूट एवं कोष्ठ आदि से सुसज्जित होना चाहिये। इसको शीर्ष- भाग पर अर्धकोटि, भद्र तथा आगे एवं पीछे भद्रनासी से युक्त करना चाहिये। दोनों पार्श्वों में चार नासियाँ, शिखर भाग शालायुक्त एवं विषम संख्या में स्थूपिकायें निर्मित होनी चाहिये। शेष अंग पूर्व के सदृश निर्मित होने चाहिये।।९८-९९।। ☀ विप्रतीकान्त-द्वारशाला ☀ विप्रतीकान्तसंस्थानं त्र्यंशे द्व्यंशाधिकायतम् ।।१००।। कूटकोष्ठादि सर्वाङ्गं पूर्ववत् परिकल्पयेत् । पूर्ववद् भूमिभागं च चतुर्दिग्गतभद्रकम् ।।१०१।। चतस्रः शिखरे नास्यः शिरो भद्रसमन्वितम् । अन्तः पादोत्तरैर्युक्तमयुग्मस्थूपिकान्वितम् ।।१०२।। द्वारशालात्रयं प्रोक्तं सर्वाङ्गं परिमण्डितम् । विप्रतीकान्त रीति से द्वारशाला—विप्रतीकान्त द्वारशाला की लम्बाई उसकी चौड़ाई से दो तिहाई अर्थात् तीन भाग में से दो भाग के बराबर अधिक रखनी चाहिये। कूट एवं कोष्ठ आदि सभी अंगों को पहले के समान निर्मित करना चाहिये। तलों का निर्माण पूर्ववर्णित विधि से करना चाहिये। चारो दिशाओं में भद्रक, शिखर पर चार नासियाँ एवं शिरो भाग को भद्र से युक्त करना चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर निर्मित करना चाहिये एवं इसे विषम संख्या में स्थूपिकाओं से युक्त करना चाहिये। इस प्रकार सभी अवयवों से युक्त तीन प्रकार की द्वारशालाओं का वर्णन किया गया।।१००-१०२।। ☀ श्रीकान्त-द्वारप्रासादः ☀ श्रीकान्तस्य च संस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम् ।।१०३।। नन्दपङ्क्तिशिवांशैश्च त्रिचतुष्पञ्चभूमयः । अन्तः पादोत्तरैर्युक्तमन्याराद्यैरलंकृतम् ।।१०४।। द्वारस्योर्ध्वेऽन्तरे रङ्गं परिभद्रसमन्वितम् । मुखेऽमुखे महानासी शालाकारशिरो भवेत् ।।१०५।। अर्धकोटिसमायुक्तं चतुष्पञ्जरशोभितम् । द्वारप्रासादसंज्ञक गोपुर का श्रीकान्त प्रकार—श्रीकान्त द्वारप्रासाद की लम्बाई
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२१ उसकी चौड़ाई से डेढ़ गुनी अधिक होती है। इसकी चौड़ाई को नौ, दस या ग्यारह भागों में बाँटना चाहिये। इसमें तीन, चार या पाच तल का निर्माण करना चाहिये। द्वार के ऊपर भीतरी भाग में रङ्ग एवं परिभद्र निर्मित करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला ( कोष्ठक ) के आकार का हो एवं सामने तथा पीछे महानासी का निर्माण होना चाहिये। इसे अर्धकोटि से युक्त एवं चार पञ्जरों से सुशोभित होना चाहिये। ✺ श्रीकेश-द्वारप्रासादः ✺ श्रीकेशस्य तु संस्थानं तारत्रिभागमायतम् ॥१०६॥ पूर्ववद् भूमिभागं च द्वारे निर्गमकुट्टिमम् । सान्धारं कूटकोष्ठादिसर्वावयवसंयुतम् ॥१०७॥ श्रीकेश रीति से द्वारप्रासाद—श्रीकेश द्वारप्रासाद में लम्बाई चौड़ाई से तीन गुनी अधिक होती है। इसके तल पहले के सदृश होने चाहिये एवं द्वार पर निर्गम कुट्टिम ( थोड़ा बाहर निकला हुआ अधिष्ठान ) निर्मित होना चाहिये। इसे अन्धार ( मध्य में स्थित मार्ग ) से युक्त एवं कूट-कोष्ठ आदि सभी अवयवों से युक्त होना चाहिये॥१०६-१०७॥ नानामसूरकस्तम्भवेदिकाद्यैरलंकृतम् । अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं मध्ये वारणशोभितम् ॥१०८॥ मुखेऽमुखे महानासी शालाकारशिरःक्रियम्। पार्श्वयोर्वेदनास्यः स्युः सर्वावयवशोभितम् ॥१०९॥ स्वस्तिकाकृतिवन्नासी सर्वत्र परिशोभिता। नन्द्यावर्तगवाक्षादिजालकाद्यैर्विचित्रितम् ॥११०॥ इसे विभिन्न प्रकार के अधिष्ठानों, स्तम्भों एवं वेदिका आदि से सुसज्जित करना चाहिये। इसके भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर तथा मध्य भाग में वारण का निर्माण करना चाहिये। इसका शिरोभाग शाला के आकार का हो एवं सामने तथा पीछे महानासी होनी चाहिये। दोनों पाश्वों में चार नासियाँ निर्मित होनी चाहिये एवं इसे सभी अंगों से युक्त होना चाहिये। सभी स्थानों पर स्वस्तिक के आकृति वाली नासियाँ सुशोभित होनी चाहिये तथा इसे नन्द्यावर्त गवाक्ष एवं जालक ( झरोखा ) आदि से सुसज्जित करना चाहिये॥१०८-११०॥ ✺ केशविशाल-द्वारप्रासादः ✺ केशविशालसंस्थानं विस्ताराध्यर्धमायतम्। पूर्ववद् भूमिभागं च मध्यवारणशोभितम् ॥१११॥ मय०-२१
३२२ मयमतम् कूटकोष्ठाद्यलङ्कारं पूर्ववत् परिकल्पयेत्। मुखे पृष्ठे द्विपाश्र्वे तु महानासीचतुष्टयम् ॥११२॥ सभाकारशिरस्तस्य मुखे पृष्ठे द्विपाश्र्वयोः। अयुग्मस्तूपिकायुक्तं द्वारप्रासादकत्रयम् ॥११३॥ केशवविशालसंज्ञक द्वारप्रासाद गोपुर--केशविशाल द्वारप्रासाद की लम्बाई चौड़ाई की डेढ़ गुनी अधिक होती है तलों का निर्माण पहले के समान होना चाहिये एवं मध्य भाग में वारण ( दालान, ओसारा ) होना चाहिये। कूट, कोष्ठ आदि अलंकरणों का निर्माण पहले की भाँति होना चाहिये। सामने, पीछे एवं दोनों पार्श्वों में चार महानासी निर्मित करनी चाहिये। इसका शिरोभाग सभा के आकार का हो। उसके मुखभाग, पृष्ठभाग एवं दोनों पार्श्वों में विषम संख्या में स्तूपिकायें होनी चाहिये। इस प्रकार द्वारप्रासाद गोपुर के तीन भेद होते हैं।।१११-११३।। ✵ स्वस्तिक - द्वारहर्म्यम् ✵ स्वस्तिकस्य तु संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् । पङ्क्तिरुद्रार्कभागैस्तु वेदपञ्चर्तुभूमयः ॥११४॥ अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं भूमिभागं च पूर्ववत् । कूटकोष्ठादिसर्वाङ्गैैरन्थाराद्यैरलङ्कृतम् ॥११५॥ सभाशिखरसंयुक्तं स्वस्तिकाकृतिनासियुक् । अष्टनासि सभाग्रे तु अयुग्मस्तूपिकान्वितम् ॥११६॥ द्वारहर्म्य गोपुर का स्वस्तिकसंज्ञक भेद—स्वस्तिकसंज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर की लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी होती है एवं चौड़ाई को दस, ग्यारह या बारह भागों में बाँटना चाहिये। इसे चार, पाँच या छः तल से युक्त निर्मित करना चाहिये। भीतरी भाग में स्तम्भ एवं उत्तर होना चाहिये तथा तलों की योजना पूर्व-वर्णित होनी चाहिये। कूट, कोष्ठ आदि सभी अवयवों तथा अन्थार आदि से इसे सुसज्जित करना चाहिये। इस गोपुर को सभाकार शिखर से युक्त तथा स्वस्तिकाकार नासियों से युक्त करना चाहिये। सभा के अग्र-भाग में आठ नासियाँ एवं विषम संख्या में स्तूपिकाओं का निर्माण करना चाहिये।।११४-११६।। ✵ दिशास्वस्तिक - द्वारहर्म्यम् ✵ दिशास्वस्तिकसंस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् । पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठाद्यलंकृतम् ॥११७॥ अन्थार्यन्थरहाराङ्गं खण्डहर्म्याभिमण्डितम् । मुखेऽमुखेऽतिभद्रांशं शिरश्चायतमण्डलम् ॥११८॥
चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३२३ महानासि चतुर्युक्तं चतुष्पञ्जरशोभितम्। अन्तः पादोत्तरैर्युक्तं सर्वावयवसंयुक्तम् ॥११९१॥ अनुक्तं पूर्ववत् सर्वमयुग्मस्तूपिकान्वितम् । दिशास्वस्तिक संज्ञक द्वारहर्म्य—दिशास्वस्तिक संज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर की लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। इसके तलों की योजना तथा कूट-कोष्ठादि सज्जा पहले के सदृश होनी चाहिये। इसे अन्धारी ( भीतरी भित्ति ), अन्धार, हाराङ्ग एवं खण्डहर्म्य से युक्त करना चाहिये। इसका शिरोभाग आयतमण्डलाकार ( गोलाई लिये लम्बाई ) एवं सामने तथा पीछे अतिभद्रांश निर्मित करना चाहिये। इसे चार महानासियों एवं चार पञ्जरों से अलंकृत करना चाहिये। भीतरी भाग को स्तम्भ, उत्तर एवं सभी अंगों से युक्त करना चाहिये। जिनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है, उन सबको पहले के समान निर्मित करना चाहिये तथा विषम संख्या में स्तूपिकायें निर्मित होनी चाहिये॥१११७-११९१॥ ✺ मर्दल-द्वारहर्म्यम् ✺ मर्दलस्य तु संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥१२०॥ पूर्ववद् भूमिभागं च कूटकोष्ठाद्यलंकृतम् । पुरे पृष्ठे सभागं स्याद् विस्तारत्र्यंशनिर्गमम् ॥१२१॥ शालाकारशिरोयुक्तं क्षुद्रनासीविभूषितम् । मुखे पृष्ठे महानासी चतुष्पञ्जरशोभितम् ॥१२२॥ अन्तःपादोत्तरैर्युक्तं द्वारहर्म्यं त्रिधोदितम् । मर्दल संज्ञक द्वारहर्म्य गोपुर—मर्दल की लम्बाई उसकी चौड़ाई की दुगुनी होती है। तलों का निर्माण एवं कूट तथा कोष्ठ आदि अलंकरणों का निर्माण पूर्ववर्णित विधि से होता है। सामने एवं पीछे सभा के अग्र भाग के सदृश निर्माण होना चाहिये तथा इसका निर्गत विस्तार के तीसरे भाग के बराबर होना चाहिये। इसका शीर्षभाग शाला के आकार का हो एवं क्षुद्रनासियों से सुसज्जित हो। मुखभाग एवं पृष्ठभाग की महानासी एवं चार पञ्जरों से सज्जा होनी चाहिये। भीतर स्तम्भ एवं उत्तर निर्मित होना चाहिये। इस प्रकार द्वारहर्म्य तीन प्रकार से वर्णित है॥१२०-१२२॥ ✺ मात्राकाण्ड-द्वारगोपुरम् ✺ मात्राकाण्डस्य संस्थानं विस्तारद्विगुणायतम् ॥१२३॥ रुद्रार्क त्रयोदशांशैः पञ्चषट्सप्तभूमयः । पूर्ववद्भूमिभागं च कूटकोष्ठादि पूर्ववत् ॥१२४॥