मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३११ दो तल का गोपुर—( द्वितल गोपुर में प्रथम तल के ) उत्तर से प्रारम्भ करते हुए शिखा ( शिरोभाग ) तक नौ बराबर भागों में बाँटना चाहिये। ( प्रथम तल के ) मञ्च की ऊँचाई सवा भाग, ढाई भाग चरण ( अर्थात् द्वितीय तल का भाग ), एक भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, एक भाग कन्धर, ढाई भाग शिरोभाग की ऊँचाई एवं शेष भाग से शिखा ( शीर्षभाग ) का उदय निर्मित करना चाहिये। इस प्रकार द्वितल का वर्णन किया गया। अब त्रितल गोपुर के भागों का वर्णन किया जा रहा है।।३८-४०।। ✺ त्रितलगोपुरम् ✺ स्तूप्यन्तमुत्तरान्तं च कृत्वोच्चं द्वादशांशकम् । सपादांशं कपोतोच्चं द्व्यंशार्धं चरणायतम् ॥४१॥ भागैकं प्रस्तरोत्सेधं द्विभागं पाददैर्घ्यकम् । त्रिपादं तत्कपोतोच्चमंशं ग्रीवोदयं भवेत् ॥४२॥ सार्धद्व्यंशं शिरस्तस्माच्छेषं स्तूप्युच्छ्रयं भवेत् । एवं त्रितलमाख्यातं चतुर्भौममथोच्यते ॥४३॥ तीन तल का गोपुर—( त्रितल गोपुर में ) स्तूपी से लेकर उत्तरपर्यन्त ऊँचाई को बारह बराबर भागों में बाँटना चाहिये। डेढ़ भाग से कपोत की ऊँचाई, ढाई भाग से चरण ( द्वितीय तल की ऊँचाई ), एक भाग से प्रस्तर, दो भाग से पाद ( तृतीय तल की ऊँचाई ), पौने एक भाग से कपोत, एक भाग से ग्रीवा, ढाई भाग से शिर एवं शेष भाग से स्तूपी ( स्तूपिका ) की ऊँचाई रखनी चाहिये। इस प्रकार त्रितल गोपुर का वर्णन किया गया। अब चतुस्तल गोपुर का वर्णन किया जा रहा है।।४१-४३।। ✺ चतुस्तलगोपुरम् ✺ उत्तरादिशिखान्तं यन्मानमष्टादशांशकम् । सत्रिपादांशकं मञ्चं त्रिभागं तलिपायतम् ॥४४॥ सार्धांशं प्रस्तरोच्चं स्याद् द्व्यंशं सार्धं पदोदयम् । सपादभागं मञ्चोच्चं द्व्यंशं स्यात् स्तम्भदैर्घ्यकम् ॥४५॥ मञ्चमंशं गलं भागं त्रिभागं शिखरोदयम् । शेषभागं शिखामानं पञ्चभौममथोच्यते । चार तल का गोपुर—( चार तल के गोपुर में ) उत्तर से शिखा तक के प्रमाण को अट्ठारह भागों में बाँटा जाता है। पौने दो भाग से मञ्च, तीन भाग से तलिप ( द्वितीय तल ), डेढ़ भाग से प्रस्तर की ऊँचाई, ढाई भाग से पद ( तृतीय तल ), सवा एक भाग से मञ्च की ऊँचाई, दो भाग से स्तम्भ की ऊँचाई ( चतुर्थ तल ), एक भाग से