मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० मयमतम् एते पञ्चदश प्रोक्ता गोपुरस्याभिधानकाः । गोपुर के प्रकार—पन्द्रह प्रकार के गोपुरों के नाम इस प्रकार हैं—श्रीकर, रति- कान्त, कान्तविजय, विजयविशालक, विशालालय, विप्रतीकान्त, श्रीकान्त, श्रीकेश, केशविशालक, स्वस्तिक, दिशास्वस्तिक, मर्दल, मात्रकाण्ड, श्रीविशाल एवं चतुर्मुख ।। ३१-३३।। एकादिपञ्चभूम्यन्तं शोभाद्यल्पप्रमाणकम् ।। ३४।। द्वितलादि षट्तलान्तं मध्यमक्रममुच्यते । त्रितलात् सप्ततलपर्यन्तं चोत्तममुच्यते ।। ३५ ।। सोपपीठमधिष्ठानं पादोच्चमुत्तरान्तकम् । शेषं तत्स्थूपिपर्यन्तं भागमानं विधीयते ।। ३६ ।। छोटे मन्दिरों में पाँच गोपुर द्वारशोभा से प्रारम्भ कर एक से पाँच तल तक क्रमशः होना चाहिये। मध्यम मन्दिरों में दो से छः तल तक एवं बड़े मन्दिरों में तीन से सात तल तक होने चाहिये ।। ३४-३५ ।। ✸ एकतलगोपुरम् ✸ स्थूप्यन्तमुत्तरान्तं च षड्भागं विभजेत्समम् । सपादभागमञ्चोच्चं कन्थरोच्चं तदंशकम् । सत्रिपादद्विभागं तु शिरःशेषं शिखोदयम् ।। ३७।। एवमेकतलं प्रोक्तं द्वितले भागमुच्यते । एक तल का गोपुर—एक तल के गोपुर की ऊँचाई उत्तरान्त से स्थूपी ( स्तूपिका ) तक छः बराबर भागों में बाँटनी चाहिये। सवा भाग मञ्च की ऊँचाई, एक भाग कन्धर, तीन चौथाई सहित दो भाग से शिरोभाग एवं शेष से शिखोदय का निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार एक तल गोपुर का वर्णन किया गया। अब दो तल गोपुर के भागों का वर्णन किया जा रहा है।। ३६-३७।। ✸ द्वितलगोपुरम् ✸ उत्तरादिशिखान्तं यन्नवधा विभजेत् समम् ।। ३८।। सपादभागमञ्चोच्चं द्व्यंशार्धं चरणायतम् । भागैकं प्रस्तरोत्सेधमेकांशं कन्थरोदयम् ।। ३९ ।। सार्धद्व्यंशं शिरस्तुङ्गं शेषभागशिखोदयम् । एवं द्वितलमाख्यातं त्रितले भागमुच्यते ।। ४० ।।