भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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चतुर्विंशोऽध्यायः 卐 गोपुरविधानम् ३०९ उनकी ऊँचाई क्रमशः उनकी चौड़ाई के पाँच भाग से सात भाग, सात भाग से दस भाग, दुगुनी, ढाई गुनी एवं सवा दोगुनी होनी चाहिये। ये पाँच ऊँचाई के प्रमाण कहे गये हैं।।२६।। अधिष्ठानादिमानम् मूलवस्तु निरीक्ष्यैव पादाधिष्ठानतुङ्गता। चतुष्पञ्चर्तुसप्ताष्टनन्दपङ्क्तीशभानुषु ॥२७॥ भागेष्वेकैकभागोनं स्वाधिष्ठानान्ततुङ्गकम्। शेषं तदुपपीठं स्यात् पादबन्धं मसूरकम् ॥२८॥ अधिष्ठान आदि के प्रमाण—प्रधान भवन को देखकर ही गोपुर के पाद ( स्तम्भ ) एवं अधिष्ठान की ऊँचाई रखनी चाहिये। अधिष्ठान की ऊँचाई प्रधान भवन के चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह एवं बारह भागों से एक-एक भाग कम रखना चाहिये। शेष भाग से उपपीठ का निर्माण करना चाहिये। यह पादबन्ध मसूरक ( अधिष्ठान ) होता है।।२७-२८।। प्रासादस्तम्भमानं वा वसुभागोनमेव वा। नन्दपङ्क्त्यंशहीनं वा गोपुरस्तम्भतुङ्गकम्॥२९॥ छेदयेत्तदधिष्ठानं होमान्तं खातपादकम्। उत्तरान्तं समुत्सेधं तदर्धं द्वारविस्तृतम् ॥३०॥ प्रवेशदक्षिणे गर्भमारूढे भित्तिके भवेत्। प्रासाद के स्तम्भ का प्रमाण भी इसी प्रकार रखना चाहिये। अथवा गोपुर-स्तम्भ की ऊँचाई आठ, नौ या दस भाग में एक-एक भाग कम रखनी चाहिये। ( स्तम्भ के लिये ) अधिष्ठान में होमान्त तक खातपादक ( स्तम्भ के लिये गड्ढा ) निर्मित करना चाहिये। इसकी ( द्वार की ) ऊँचाई उत्तर ( भित्ति का भागविशेष ) तक रखनी चाहिये एवं द्वार का विस्तार इसका आधा होना चाहिये। प्रवेश के दक्षिण में भित्ति के नीचे गर्भन्यास ( शिलान्यास ) करना चाहिये।।२९-३०।। ✺ गोपुरभेदाः ✺ श्रीकरं रतिकान्तं च कान्तविजयमेव च॥३१॥ विजयविशालकं चैव विशालालयमेव च। विप्रतीकान्तं श्रीकान्तं श्रीकेशं च तथा पुनः॥३२॥ केशविशालकं स्वस्तिकं दिशास्वस्तिकमेव च। मर्दलं मात्रकाण्डं च श्रीविशालं चतुर्मुखम्॥३३॥