भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३०८ मयमतम् करना चाहिये। द्वारशोभा आदि पाँच द्वारों की चौड़ाई उनके लम्बाई की डेढ़ गुनी, पौने दो गुनी, दुगुनी अथवा पौने तीन गुनी निर्धारित करनी चाहिये। चौड़ाई के क्रम से ही अब उनकी ऊँचाई का वर्णन किया जा रहा है।।१८-१९।। सप्तांशे च दशांशं च चतुरंशे षडंशकम् । सप्तभागं चतुर्भागे त्रित्रिभागं तु पञ्चके ।।२०।। द्विगुणं तु यथासंख्यं द्वारायतनतुङ्गता । गोपुरस्य तु विस्तारत्रिभागादेकभागिकम् ।।२१।। चतुर्भागैकभागं च पञ्चभागद्विभागिकम् । निर्गमं गोपुराणां तु प्राकाराद्भित्तिबाह्यतः ।।२२।। द्वारों की चौड़ाई के सात भाग में दशवाँ भाग, चार भाग में छठा भाग, चार भाग में सातवाँ भाग तथा पाँच भाग में नवाँ भाग एवं दुगुना मान ऊँचाई के लिये क्रमशः ग्रहण करना चाहिये। गोपुर के द्वारायतन (द्वार पर निर्मित भवन) की ऊँचाई के ये मान कहे गये हैं। प्राकारभित्ति की चौड़ाई का तीसरा भाग, एक चौथाई अथवा पाँच भाग में से दो भाग के बराबर गोपुरों का निर्गम (बाहर की ओर निकला हुआ निर्माण- विशेष) निर्मित करना चाहिये ।।२०-२२।। ❋ द्वारमानम् ❋ मूलं सार्धं तु पादोनद्विहस्तं तु द्विहस्तकम् । तत्तत्षडङ्गुलैर्नन्दमात्रैर्द्वादशमात्रकैः ।।२३।। वृद्ध्या पञ्चकरान्तं तु सप्तान्तं तु नवान्तकम् । द्वारं त्रिःपञ्चधामानमेकैकं तु पृथक् पृथक् ।।२४।। क्षुद्रे मध्ये वरे द्वारविस्ताराः परिकीर्तिताः । तत्तद्वैपुल्यवशतस्तत्तदुत्सेधमुच्यते ।।२५।। द्वार-प्रमाण— क्षुद्र (छोटे), मध्यम एवं श्रेष्ठ (बड़े) द्वारों का विस्तार-प्रमाण इस प्रकार होता है। क्षुद्र द्वार की चौड़ाई डेढ़ से प्रारम्भ कर पाँच हाथ तक छः-छः अंगुल बढ़ाते हुये ले जाना चाहिये। मध्यम द्वार की चौड़ाई दो हाथ से प्रारम्भ करते हुये सात हाथ तक नौ-नौ अंगुल बढ़ाते हुये ले जाना चाहिये। बड़े द्वार की चौड़ाई दो हाथ से प्रारम्भ करते हुये नौ हाथ तक बारह अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुये ले जाना चाहिये। इस प्रकार प्रत्येक द्वार के पन्द्रह प्रमाण पृथक्-पृथक् प्राप्त होते हैं। विस्तार के अनुसार उनकी ऊँचाई अग्र वर्णित प्रकार से प्राप्त होती है।।२३-२५।। पञ्चांशेभ्यश्च सप्तांशं सप्तांशेभ्यो दशांशकम् । द्विगुणार्धाधिकं पादाधिकं पञ्चोच्छ्रयाः स्मृताः ।।२६।।